सुरक्षित कर्ज का बढ़ता चलन
गोल्ड लोन सेक्टर में यह अभूतपूर्व विस्तार कई वजहों से हो रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 की तीसरी तिमाही में नए लोन सोर्सिंग वैल्यू में 91% की जोरदार बढ़ोतरी देखी गई, जबकि पूरा बाजार पिछले साल के मुकाबले 42% बढ़कर नवंबर 2025 तक ₹15.6 ट्रिलियन के स्तर पर पहुंच गया। इसकी मुख्य वजहें हैं सोने की लगातार ऊंची कीमतें (जो 2026 की शुरुआत में करीब ₹1,59,000 प्रति 10 ग्राम थीं) और बरोअर्स (borrowers) की सुरक्षित लेंडिंग (secured lending) की ओर बढ़ती प्राथमिकता। इसी के चलते बैंकों ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के साथ फासला तेजी से पाट लिया है। मार्च 2025 तक कुल गोल्ड लोन में बैंकों की हिस्सेदारी बढ़कर 49.7% हो गई, जो 2020 में सिर्फ 30.6% थी। वहीं, NBFCs की हिस्सेदारी घटकर 50.3% रह गई है। यह दिखाता है कि बाजार में आक्रामक प्राइसिंग और बढ़ती स्वीकार्यता के चलते कड़ी प्रतिस्पर्धा है।
बदलते रेगुलेटरी नियम
अब बात करते हैं RBI के नए नियमों की, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले हैं और गोल्ड लोन बाजार को एक नई दिशा देंगे। सबसे बड़ा बदलाव टियर्ड लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेशियो में है। ₹2.5 लाख तक के लोन पर 85% तक LTV मिलेगा, जबकि इससे ऊपर के लोन के लिए यह 80% और 75% होगा। खास बात यह है कि ₹2.5 लाख से कम के लोन के लिए इनकम असेसमेंट और क्रेडिट अप्रैजल की जरूरतें खत्म कर दी गई हैं, जिससे बड़ी आबादी के लिए लोन लेना आसान हो जाएगा। बुलेट रीपेमेंट (bullet repayment) लोन की अवधि अब 12 महीने तक सीमित कर दी गई है, ताकि लंबी अवधि तक लोन रोलओवर न हो सके। इसके अलावा, लेंडर्स (lenders) को लोन बंद होने के सात वर्किंग दिनों के भीतर गिरवी रखे सोने को वापस करना होगा, देरी पर पेनल्टी लगेगी। प्राथमिक गोल्ड बुलियन या ETF के खिलाफ लोन अब पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इन उपायों का मकसद बरोअर एक्सेस (borrower access) को बढ़ाना और साथ ही ट्रांसपेरेंसी (transparency) और रिस्क मैनेजमेंट (risk management) को मजबूत करना है।
ब्याज दरों का खेल: दोधारी तलवार
गोल्ड लोन, अनसिक्योर्ड बरोइंग (unsecured borrowing) के मुकाबले एक आकर्षक विकल्प बना हुआ है। बैंकों द्वारा पेश की जाने वाली ब्याज दरें 8.25% से 14% प्रति वर्ष के बीच हैं, जबकि NBFCs 27% तक चार्ज कर सकते हैं। यह रेंज गोल्ड लोन को ज्यादातर पर्सनल लोन (personal loan) से सस्ता बनाती है, जिनकी ब्याज दरें आमतौर पर 8.75% से 24% सालाना के बीच होती हैं। हालांकि, लोन की अवधि बढ़ने पर असल लागत बढ़ सकती है। बाजार के बड़े खिलाड़ी जैसे Muthoot Finance (जिसका P/E रेशियो 2026 की शुरुआत में लगभग 16 था) और Manappuram Finance (जिसका P/E रेशियो 64-65 के करीब था) इस बदलते परिदृश्य में काम कर रहे हैं। हालांकि ये लिक्विडिटी (liquidity) प्रदान करते हैं, लेकिन इनकी असली लागत हेडलाइन रेट से कहीं अधिक हो सकती है।
सिस्टमैटिक रिस्क और बरोअर की कमज़ोरी
गोल्ड लेंडिंग में यह भारी उछाल, जो जरूरी लिक्विडिटी (liquidity) प्रदान कर रहा है, कुछ कमजोरियों को भी उजागर करता है। सोने की ऊंची कीमतें, जो लोन की रकम बढ़ाती हैं, बाजार में गिरावट आने पर जोखिम को भी कई गुना बढ़ा सकती हैं। ऐसे में बरोअर्स के लिए डिफॉल्ट (default) का खतरा बढ़ सकता है, खासकर वे जो अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए पूरी तरह सोने पर निर्भर हैं। भारतीय घरों में सोने का भावनात्मक मूल्य भी एक अतिरिक्त जोखिम जोड़ता है, जो एक व्यावहारिक समाधान को गहरे व्यक्तिगत संकट में बदल सकता है यदि लोन चुकाना असंभव हो जाए। क्रेडिट इंस्ट्रूमेंट (credit instrument) के तौर पर सोने पर बढ़ती निर्भरता एक बड़े जनसमूह के लिए अंतर्निहित आर्थिक अस्थिरता का संकेत दे सकती है। इसके अलावा, सोने जैसी अस्थिर कमोडिटी (commodity) के खिलाफ लेंडिंग का संकेन्द्रण, वित्तीय क्षेत्र को कमोडिटी की कीमतों में झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।
भविष्य का नज़रिया: एक मुख्यधारा का वित्तीय टूल
गोल्ड लोन सेक्टर का भविष्य काफी मजबूत दिख रहा है, और अनुमान है कि भारत के क्रेडिट इकोसिस्टम (credit ecosystem) में अपनी स्थापित भूमिका के कारण इसमें लगातार बढ़ोतरी जारी रहेगी। यह सेक्टर अब सिर्फ आपातकालीन समाधान की बजाय एक मुख्यधारा का वित्तीय टूल (mainstream financial tool) माना जा रहा है। यह सब एक आम तौर पर आशावादी मैक्रोइकॉनॉमिक माहौल (macroeconomic environment) का भी समर्थन करता है। फाइनेंशियल ईयर 2026 और 2027 में भारत की GDP ग्रोथ 6.6% से 7.8% रहने का अनुमान है, और महंगाई काबू में रहने की उम्मीद है। RBI के नियामक समायोजन (regulatory adjustments) बरोअर एक्सेस (borrower access) को बढ़ाने और साथ ही विवेकपूर्ण मानदंडों (prudential norms) को संतुलित करने का लक्ष्य रखते हैं, जिससे गोल्ड लोन भारत के क्रेडिट लैंडस्केप (credit landscape) का एक महत्वपूर्ण, हालांकि सावधानीपूर्वक निगरानी वाला, हिस्सा बना रहेगा।