Festive Credit Rush: नो-कॉस्ट EMI के नाम पर छिपा है बड़ा जाल, समझें अपनी जेब का गणित

PERSONAL-FINANCE
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Festive Credit Rush: नो-कॉस्ट EMI के नाम पर छिपा है बड़ा जाल, समझें अपनी जेब का गणित

अक्टूबर 2026 में त्योहारी सीजन के चलते 'नो-कॉस्ट' EMI और आसान क्रेडिट की बाढ़ आई है। भले ही ये विकल्प शॉपिंग को आसान बनाते हैं, लेकिन इनमें छिपे हुए खर्च आपके बजट को बिगाड़ सकते हैं। निवेशकों को भी संभलने की जरूरत है, क्योंकि कर्ज का यह बढ़ता बोझ बैंकों के लिए मुसीबत बन सकता है।

त्योहारों के इस सीजन में भारत में खरीदारी का माहौल जोरों पर है। लोग जमकर इलेक्ट्रॉनिक्स और महंगे सामान खरीद रहे हैं, और इस खरीदारी को हवा दे रहे हैं लुभावने 'नो-कॉस्ट' EMI ऑफर। ये ऑफर आपकी खरीदारी को आसान तो बनाते हैं, लेकिन इनमें छिपी हुई शर्तें आपकी आर्थिक सेहत बिगाड़ सकती हैं।

कहाँ फंसते हैं ग्राहक?

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादातर 'इंटरेस्ट-फ्री' स्कीम में प्रोसेसिंग फीस और GST जैसे छिपे हुए चार्ज होते हैं, जिससे सामान की असली कीमत नकद भुगतान से कहीं ज्यादा हो जाती है। लोग छोटी EMI देखकर खुश तो हो जाते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि उनका कुल कर्ज कितना बढ़ गया है। आज के समय में लोग जरूरत से ज्यादा 'आकांक्षात्मक खरीदारी' (Aspirational Buying) कर रहे हैं और एक साथ कई लोन के जाल में फंस रहे हैं।

कर्ज का सही पैमाना क्या है?

आर्थिक अनुशासन के लिए यह जरूरी है कि आपकी कुल मासिक EMI (होम लोन, कार लोन और फेस्टिव लोन समेत) आपकी टेक-होम सैलरी के 35% से 40% से ज्यादा न हो। यदि आप इस सीमा को पार करते हैं, तो मेडिकल इमरजेंसी जैसी स्थितियों में आपके पास फंड की कमी हो सकती है। किसी भी नए कर्ज को लेने से पहले कम से कम 6 महीने के खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड बनाना अनिवार्य है।

बैंकों और निवेशकों के लिए चेतावनी

बाजार के जानकारों की नजर अब अनसिक्योर्ड रिटेल लोन (Unsecured Retail Loan) के बढ़ने पर है। हालाँकि यह बैंकों और NBFCs के लिए शॉर्ट-टर्म रेवेन्यू बढ़ा रहा है, लेकिन अगर फेस्टिव सीजन के बाद डिफॉल्ट्स (Defaults) बढ़ते हैं, तो यह लेंडर्स की एसेट क्वालिटी पर बुरा असर डाल सकता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) लगातार इसे मॉनिटर कर रहा है।

निवेशकों को सलाह है कि वे आने वाली तिमाहियों के रिजल्ट्स में बैंकों के रिटेल क्रेडिट सेगमेंट की डेलिक्वेंसी रेट (Delinquency Rate) पर कड़ी नजर रखें। सिर्फ लोन ग्रोथ ही नहीं, बल्कि लेंडर्स का रिस्क मैनेजमेंट ही आने वाले समय में उनकी मजबूती तय करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.