बार-बार खरीदने-बेचने का महंगा सौदा
कई निवेशकों का मानना है कि लगातार शेयर खरीदना और बेचना उनकी कुशलता को दर्शाता है। लेकिन, यह 'ओवरट्रेडिंग' (Overtrading) हाई ट्रांजैक्शन कॉस्ट और टैक्स के कारण निवेशक की दौलत को खत्म कर देती है, और अक्सर यह भावनात्मक फैसलों से प्रेरित होती है। Fortuna Asset Managers के पार्टनर जयंत मंगलिक बताते हैं कि बार-बार ट्रेडिंग से सालाना 2-3% का मामूली नुकसान भी, कंपाउंडिंग के कारण 20 सालों में पोर्टफोलियो को 25-30% तक सिकोड़ सकता है।
निवेश को एक जगह केंद्रित करने का जाल
बाजार के मौजूदा प्रदर्शन से प्रेरित होकर, विनिंग सेक्टर्स या एसेट्स में और अधिक निवेश करने की चाहत एक बड़ा 'कंसन्ट्रेशन रिस्क' (Concentration Risk) पैदा करती है। बुल मार्केट में यह एक स्मार्ट रणनीति लग सकती है, लेकिन मंदी के दौरान यह पोर्टफोलियो को बड़े झटकों के प्रति संवेदनशील बना देती है। मंगलिक इस बात पर जोर देते हैं कि स्टॉक्स, बॉन्ड्स और सोने में 'डाइवर्सिफाइड' (Diversified) पोर्टफोलियो बनाए रखना लंबी अवधि के नतीजों के लिए महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि सिर्फ इंडिविजुअल स्टॉक्स चुनने के बजाय 'एसेट एलोकेशन' (Asset Allocation) महत्वपूर्ण है।
'मार्केट टाइमिंग' का भ्रम
बहुत से निवेशक मार्केट में 'परफेक्ट' मौकों, जैसे बड़ी गिरावट, चुनाव नतीजे या ग्लोबल खबरों का इंतज़ार करते हुए नकदी (Cash) को होल्ड करके रखते हैं। लेकिन, इस देरी की एक छिपी हुई कीमत होती है। मार्केट की चाल का अनुमान लगाना मुश्किल है, और कुछ बेहतरीन ट्रेडिंग के दिनों को चूकने से रिटर्न बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यह साबित हो चुका है कि 'टाइम इन द मार्केट' (Time in the Market) 'मार्केट टाइमिंग' (Market Timing) से बेहतर है। वहीं, अप्रयुक्त नकदी महंगाई के कारण अपनी क्रय शक्ति खो देती है। 'सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान' (Systematic Investment Plans - SIPs) जैसे तरीके से नियमित निवेश करना टाइमिंग के रिस्क को मैनेज करने और स्थिर वृद्धि बनाने का एक व्यावहारिक तरीका है।