ESOPs पर टैक्स का गणित अक्सर निवेशकों को उलझा देता है। यह एक्सरसाइज और सेल, दोनों स्टेज पर टैक्स के दायरे में आता है। गलत कॉस्ट ऑफ एक्विजिशन (Cost of Acquisition) के कारण कई कर्मचारी अनजाने में ज्यादा टैक्स भर देते हैं।
ESOPs (Employee Stock Option Plans) वेल्थ क्रिएशन का एक दमदार जरिया हैं, लेकिन इनका टैक्स स्ट्रक्चर काफी जटिल होता है। अक्सर जानकारी के अभाव में कर्मचारी अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में गंवा देते हैं।\n\n### 'ड्राय टैक्स' (Dry Tax) का असली खेल\nटैक्स की पहली मार तब पड़ती है जब आप अपने ऑप्शंस को एक्सरसाइज करते हैं। इनकम टैक्स विभाग एक्सरसाइज प्राइस और शेयर की फेयर मार्केट वैल्यू (FMV) के अंतर को 'परक्विजिट' (Perquisite) मानता है और इसे सैलरी इनकम की तरह टैक्स करता है। इसे 'ड्राय टैक्स' कहा जाता है, क्योंकि शेयर बिके नहीं होते, फिर भी आपको अपनी जेब से टैक्स चुकाना पड़ता है।\n\n### डबल टैक्सेशन से कैसे बचें?\nसबसे बड़ी गलती तब होती है जब शेयर को फाइनल बेचा जाता है। लोग अक्सर खरीद मूल्य (Exercise Price) को ही कॉस्ट ऑफ एक्विजिशन मान लेते हैं।\n\nइसे एक उदाहरण से समझें:\nमान लीजिए एक्सरसाइज प्राइस ₹100 है और FMV ₹500 है। आप ₹400 के अंतर पर पहले ही टैक्स दे चुके हैं। बाद में अगर आप शेयर ₹600 में बेचते हैं, तो आपका कॉस्ट बेसिस ₹100 नहीं, बल्कि ₹500 होना चाहिए। अगर आप ₹100 को आधार मानेंगे, तो आप उन ₹400 पर दोबारा टैक्स भरेंगे, जिस पर पहले ही टैक्स लग चुका है।\n\n### होल्डिंग पीरियड और टैक्स प्लानिंग\nलिस्टेड कंपनियों के लिए 12 महीने से ज्यादा होल्ड करने पर यह लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) के दायरे में आता है, जिस पर कम टैक्स लगता है। अनलिस्टेड कंपनियों के लिए यह अवधि 24 महीने की है। लेकिन ध्यान रहे, टैक्स बचाने के चक्कर में कंपनी की वैल्यू और लिक्विडिटी को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।\n\n### जरूरी दस्तावेज\nअनलिस्टेड कंपनियों के मामलों में कैटेगरी-I मर्चेंट बैंकर से लिया गया वैल्यूएशन सर्टिफिकेट संभाल कर रखें। यह इनकम टैक्स विभाग की पूछताछ के समय आपके पास एक पक्का सबूत होगा।
