रिटायरमेंट फंड बनाने के लिए EPF और NPS दोनों ही अहम हैं। जहाँ EPF **8.25%** का फिक्स्ड रिटर्न देता है, वहीं NPS में मार्केट-लिंक्ड ग्रोथ की संभावना है। टैक्स बेनेफिट्स और नए लिक्विडिटी नियमों को समझकर आप अपना भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं।
भारत में रिटायरमेंट प्लानिंग मुख्य रूप से दो सरकारी स्कीमों के इर्द-गिर्द घूमती है: एम्प्लॉयी प्रोविडेंट फंड (EPF) और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS)। दोनों का मकसद रिटायरमेंट के बाद का कॉर्पस बनाना है, लेकिन इनके काम करने का तरीका, जोखिम और पहुंच बिल्कुल अलग है।
EPF: सुरक्षित निवेश का आधार
नौकरीपेशा लोगों के लिए EPF एक कंजर्वेटिव विकल्प है। इसमें कर्मचारी और नियोक्ता दोनों बेसिक सैलरी का 12% हिस्सा जमा करते हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी सरकारी ब्याज दर है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए 8.25% तय की गई है। यह स्टॉक मार्केट की उतार-चढ़ाव से दूर है। साथ ही, यह इमरजेंसी में घर बनाने या मेडिकल जरूरतों के लिए पैसे निकालने की सुविधा भी देता है, जो इसे एक बेहतरीन सेफ्टी नेट बनाता है।
NPS: ग्रोथ का इंजन
वहीं, NPS एक मार्केट-लिंक्ड प्रोडक्ट है, जो निवेशकों को इक्विटी, कॉर्पोरेट बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज में पैसा लगाने की आजादी देता है। दिसंबर 2025 में आए बदलावों के बाद NPS और भी आकर्षक हो गया है। अब अनिवार्य एन्युटी (Annuity) की शर्तों को घटाकर कुछ मामलों में 20% तक किया गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर पैसा निकालना आसान हो गया है।
टैक्स प्लानिंग का गणित
टैक्स के लिहाज से भी दोनों अलग हैं। EPF में ₹2.5 लाख से ऊपर के योगदान पर ब्याज टैक्स के दायरे में आता है, जबकि NPS पुरानी टैक्स व्यवस्था में सेक्शन 80CCD(1B) के तहत अतिरिक्त ₹50,000 की छूट देता है। वहीं, नई और पुरानी दोनों व्यवस्थाओं में नियोक्ता के योगदान पर सेक्शन 80CCD(2) के तहत बेसिक सैलरी के 14% तक की छूट मिल सकती है।
क्या है सही रणनीति?
आजकल निवेशक हाइब्रिड रणनीति अपना रहे हैं—EPF को फिक्स्ड इनकम के लिए और NPS को इक्विटी-लिंक्ड ग्रोथ के लिए। हालांकि, यह न भूलें कि EPF की ब्याज दर हर साल बदल सकती है और NPS पर मार्केट रिस्क बना रहता है। निवेश से पहले अपनी टैक्स व्यवस्था को जरूर चेक करें, क्योंकि यही तय करेगा कि आप किस स्कीम का पूरा फायदा उठा पाएंगे।
