रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए Employees' Provident Fund (EPF) की सुरक्षा और National Pension System (NPS) की ग्रोथ के बीच तालमेल बिठाना जरूरी है। **₹2.5 लाख** की निवेश सीमा और टैक्स लाभों को समझकर आप जोखिम को मैनेज करते हुए बेहतर रिटर्न हासिल कर सकते हैं।
भारत में रिटायरमेंट की प्लानिंग करते समय लोग अक्सर दुविधा में रहते हैं कि EPF और NPS में से किसे चुनें। असल में, ये दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक (Complementary) हैं। अपने वित्तीय भविष्य को मजबूत करने के लिए इनकी बारीकियों को समझना बेहद जरूरी है।
EPF: सुरक्षा और फिक्स्ड रिटर्न
EPF नौकरीपेशा लोगों के लिए रिटायरमेंट फंड की नींव है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए इसकी ब्याज दर 8.25% तय की गई है। यह सरकारी गारंटी के साथ आता है, जो मार्केट के उतार-चढ़ाव से निवेश को सुरक्षित रखता है। हालांकि, हाई-इनकम वाले निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि ₹2.5 लाख सालाना से ज्यादा के योगदान पर मिलने वाले ब्याज पर टैक्स लगता है।
NPS: लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन
NPS उन लोगों के लिए है जो मार्केट-लिंक्ड रिटर्न चाहते हैं। इसमें आपका पैसा इक्विटी, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स और सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश होता है। लंबी अवधि में यह महंगाई को मात देने वाला रिटर्न दे सकता है। टैक्स बचाने के लिए NPS टियर-1 अकाउंट में सेक्शन 80CCD(1B) के तहत ₹50,000 की अतिरिक्त कटौती का लाभ मिलता है, जो 80C की लिमिट से अलग है।
लिक्विडिटी और मैच्योरिटी के नियम
EPF के मुकाबले NPS में पैसा निकालना थोड़ा मुश्किल है। EPF में आप मेडिकल इमरजेंसी, शिक्षा या घर खरीदने के लिए आसानी से पैसा निकाल सकते हैं, जबकि NPS में 60 साल की उम्र तक लॉक-इन रहता है। मैच्योरिटी पर आपको कम से कम 40% फंड से एन्युटी खरीदना अनिवार्य होता है, जिस पर मिलने वाली आय टैक्सेबल होती है।
स्मार्ट स्ट्रैटेजी: 'कोर-एंड-सैटेलाइट' अप्रोच
निवेश विशेषज्ञ अक्सर 'कोर-एंड-सैटेलाइट' पोर्टफोलियो बनाने की सलाह देते हैं। इसमें EPF को अपना सुरक्षित 'कोर' बनाएं और NPS को 'सैटेलाइट' की तरह इस्तेमाल करके ग्रोथ पर फोकस करें। इससे जोखिम कम होता है और रिटायरमेंट के लिए एक संतुलित फंड तैयार होता है। अपनी निवेश क्षमता और रिटायरमेंट के समय को ध्यान में रखकर ही सही अनुपात तय करें।
