क्रेडिट कार्ड पर 'मिनिमम अमाउंट ड्यू' (Minimum Amount Due) का विकल्प ग्राहकों को थोड़ी राहत तो देता है, लेकिन यह एक बड़े कर्ज के जाल में फंसा सकता है। यह सुविधा आपको बैंक के साथ एक्टिव रखती है, लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी पड़ती है।
मिनिमम पेमेंट से कैसे बढ़ता है कर्ज?
अगर आप क्रेडिट कार्ड का बिल आने पर सिर्फ मिनिमम पेमेंट करते हैं, तो आपकी EMI फ्री ग्रेस पीरियड (Interest-free grace period) खत्म हो जाती है। इसका मतलब है कि बैंक आपके पूरे बिल अमाउंट पर ब्याज लगाना शुरू कर देता है, न कि सिर्फ बची हुई राशि पर।
ब्याज का मकड़जाल
भारत में क्रेडिट कार्ड पर एनुअल परसेंटेज रेट (APR) अक्सर 30% से 45% तक होता है। यानी, अगर आपने छोटी सी राशि भी नहीं चुकाई, तो उस पर भी भारी-भरकम ब्याज लगने लगता है, जिससे आपका छोटा कर्ज भी जल्दी ही एक बड़ी देनदारी बन जाता है।
क्रेडिट स्कोर पर असर
लगातार मिनिमम पेमेंट करने से आपका क्रेडिट यूटिलाइजेशन रेश्यो (Credit Utilization Ratio) यानी आपके क्रेडिट लिमिट का कितना हिस्सा आप इस्तेमाल कर रहे हैं, वह 30% से ऊपर बना रहता है। एक्सपर्ट्स की मानें तो यह रेश्यो 30% से कम रखना चाहिए। ज्यादा यूटिलाइजेशन रेश्यो यह दिखाता है कि आप पर वित्तीय बोझ ज्यादा है, जिससे आपका क्रेडिट स्कोर कम हो सकता है। भविष्य में लोन मिलने या उस पर ब्याज दरें तय होने में यह दिक्कत पैदा कर सकता है।
मिनिमम पेमेंट क्यों खतरनाक है?
यह सुविधा डिफ़ॉल्ट (Default) होने से तो बचाती है, लेकिन यह कर्ज चुकाने का सही तरीका नहीं है। मिनिमम पेमेंट में मूलधन (Principal) का एक छोटा हिस्सा ही कवर होता है, जिससे कर्ज चुकाने में सालों लग सकते हैं। इस चक्र में आप ब्याज चुकाने में ही ज्यादा पैसे खर्च कर देते हैं और मूल कर्ज कम नहीं हो पाता।
क्या है सही तरीका?
क्रेडिट कार्ड को पैसे उधार लेने का जरिया न समझें, बल्कि इसे पेमेंट टूल की तरह इस्तेमाल करें। बिल की पूरी राशि ड्यू डेट से पहले चुकाना ही ब्याज से बचने का सबसे अच्छा तरीका है। अगर आपका कर्ज पहले से ही काफी बढ़ गया है, तो मिनिमम पेमेंट से ज्यादा चुकाने की योजना बनाएं ताकि आप अपने कैश फ्लो को कंट्रोल कर सकें और लंबी अवधि में अपने क्रेडिट हेल्थ को सुरक्षित रख सकें।
