फिनटेक ऐप्स जो सेविंग अकाउंट से ज़्यादा रिटर्न का वादा करती हैं, उनमें मार्केट का जोखिम और टैक्स की देनदारी छुपी होती है। निवेशकों को एग्जिट लोड, प्लेटफॉर्म फीस और डिपॉजिट इंश्योरेंस की कमी को ध्यान में रखना चाहिए। ये टूल इमरजेंसी सेविंग के बजाय प्लान किए गए छोटे खर्चों के लिए बेहतर हैं।
कैसे काम करती हैं ये ऐप्स?
महंगाई के इस दौर में, सेविंग अकाउंट में रखे बेकार पैसे की वैल्यू कम होती जा रही है। इसी वजह से, ज़्यादातर निवेशक अब 'कैश ऑप्टिमाइजेशन ऐप्स' की ओर रुख कर रहे हैं। ये ऐप्स, जो अक्सर फिनटेक कंपनियां या म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर चलाती हैं, बैंक सेविंग अकाउंट के 2.5% से 3% के मामूली ब्याज से बेहतर रिटर्न देने का दावा करती हैं। ये ऐप्स आपके पैसे को लिक्विड म्यूचुअल फंड या फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश करके, कम समय के लिए रखे जाने वाले कैश को मैनेज करने का आसान तरीका पेश करती हैं। लेकिन, निवेश करने से पहले आपको इन ऐप्स के असली स्ट्रक्चर, छुपी हुई लागतों और जोखिमों को समझना ज़रूरी है।
रिटर्न कैसे जनरेट होता है?
ज़्यादातर कैश ऑप्टिमाइजेशन ऐप्स, बेकार पड़े पैसों को कम जोखिम वाले फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स में ऑटोमैटिकली इन्वेस्ट करके काम करती हैं। Multipl जैसी कंपनियां लिक्विड म्यूचुअल फंड पर फोकस करती हैं और अक्सर ब्रांड वाउचर पर डिस्काउंट के साथ रिटर्न भी देती हैं। वहीं, Jupiter जैसी ऐप्स गोल-बेस्ड सेविंग के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट का इस्तेमाल करती हैं। SBI Mutual Fund, HDFC Mutual Fund, और ICICI Prudential Mutual Fund जैसी बड़ी फंड हाउसेस इन ऐप्स के लिए अंडरलाइंग प्रोडक्ट मुहैया कराती हैं, जिनमें अक्सर लिक्विड स्कीम के लिए इंस्टेंट रिडेम्पशन (तुरंत पैसे निकालने) की सुविधा भी होती है। इनका मुख्य उद्देश्य मार्केट से जुड़े रिटर्न देना है, जो आम तौर पर सालाना 5% से 7% तक हो सकते हैं, और साथ ही पैसे की लिक्विडिटी (आसानी से निकालने की सुविधा) भी बनी रहती है।
छुपी हुई लागतें और टैक्स का गणित
ज़्यादा रिटर्न की संभावना तो है, लेकिन कुछ फैक्टर्स आपके असली फायदे को कम कर सकते हैं। आपको यह ज़रूर चेक करना चाहिए कि ऐप डायरेक्ट प्लान में निवेश कर रही है या रेगुलर प्लान में। रेगुलर प्लान में एक 'ट्रेल कमीशन' होता है जो डिस्ट्रीब्यूटर को मिलता है, जिससे निवेशक का नेट रिटर्न कम हो जाता है। इसके अलावा, खरीद पर 0.005% की स्टैंप ड्यूटी भी लगती है, जिसे निवेशक अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। टैक्स भी एक बड़ा रोल निभाता है, क्योंकि डेट-ओरिएंटेड फंड्स से होने वाली कमाई पर इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है, ठीक वैसे ही जैसे सेविंग अकाउंट के इंटरेस्ट पर लगता है। पुराने टैक्स रेजीम के कुछ सेक्शन के तहत सेविंग अकाउंट पर टैक्स छूट मिल सकती है, लेकिन इन निवेशों पर वैसी कोई छूट नहीं मिलती।
जोखिम को समझना क्यों ज़रूरी है?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा फर्क यह है कि इन ऐप्स में रखे पैसे बैंक डिपॉजिट के बराबर नहीं हैं। इन्हें डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) का कवर नहीं मिलता, जो बैंक डिपॉजिट को एक निश्चित सीमा तक बचाता है। इसके अलावा, रिटर्न मार्केट से जुड़े होते हैं और इंटरेस्ट रेट साइकिल व मनी मार्केट की कंडीशन के हिसाब से बदल सकते हैं। पैसों को निकालने में भी सीमाएं हो सकती हैं; उदाहरण के लिए, तुरंत विड्रॉल की लिमिट लागू हो सकती है, और कुछ लिक्विड फंड्स में शुरुआती कुछ दिनों में पैसे निकालने पर 'एग्जिट लोड' लग सकता है। 'ओवरनाइट फंड्स' एक विकल्प हैं जिनसे ये शुरुआती रिडेम्पशन पेनल्टी बच जाती है, लेकिन उनका यील्ड प्रोफाइल अलग हो सकता है। निवेशकों को इन ऐप्स को इमरजेंसी फंड के बजाय, प्लान किए गए, छोटे-मोटे खर्चों के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, जहाँ सबसे ज़्यादा सर्टेनिटी और तुरंत, बिना शर्त एक्सेस की ज़रूरत होती है।
