अगर आप कार लोन की EMI नहीं भर पा रहे हैं, तो बैंक को गाड़ी जब्त करने का कानूनी अधिकार है, लेकिन इसके लिए उन्हें RBI की गाइडलाइन्स का पालन करना होगा। रिकवरी के नाम पर बदसलूकी या जबरदस्ती करना पूरी तरह से गलत है।
जब कोई कर्जदार अपनी कार लोन की किस्तें (EMI) समय पर नहीं चुका पाता, तो बैंक के पास उस वाहन को जब्त (Reposess) करने का कानूनी अधिकार होता है क्योंकि गाड़ी लोन के लिए कोलेटरल के तौर पर रखी जाती है। हालांकि, यह रिकवरी प्रक्रिया मनमानी नहीं हो सकती। सभी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के कड़े नियमों और लोन एग्रीमेंट की शर्तों का पालन करना अनिवार्य है।
गाड़ी रिकवरी की कानूनी प्रक्रिया
RBI का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी वाहन को जब्त करने से पहले बैंक को एक पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी होगी। इसमें कर्जदार को आधिकारिक नोटिस भेजना और बकाया चुकाने के लिए एक निश्चित ग्रेस पीरियड देना शामिल है। बैंक बिना किसी चेतावनी के अचानक गाड़ी नहीं उठा सकते। इसका उद्देश्य रिकवरी को एक कानूनी प्रक्रिया बनाए रखना है, न कि उसे टकराव का जरिया बनाना।
रिकवरी एजेंट की दादागिरी के खिलाफ सुरक्षा
अक्सर लोग यह गलतफहमी पाल लेते हैं कि बैंक अपना पैसा वसूलने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट और RBI दोनों ने साफ किया है कि रिकवरी एजेंट किसी भी तरह की शारीरिक धमकी, बदसलूकी या सार्वजनिक अपमान का सहारा नहीं ले सकते। यदि कोई एजेंट आपको डराता-धमकाता है, तो आपके पास उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का पूरा हक है। आप बैंक की इंटरनल ग्रीवेंस सेल में शिकायत कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर RBI के ओम्बड्समैन (Ombudsman) के पास भी जा सकते हैं।
क्या गाड़ी देने से कर्ज खत्म हो जाता है?
यह एक बड़ी गलतफहमी है कि गाड़ी बैंक को दे देने से लोन का हिसाब चुकता हो गया। बैंक गाड़ी को बेचकर अपना बकाया वसूलता है। यदि गाड़ी बिकने के बाद भी लोन की राशि कम पड़ जाती है, तो बाकी बचा हुआ पैसा कर्जदार को ही देना होता है। इसे 'डेफिसिएंसी क्लेम' कहा जाता है। इसलिए, समस्या से भागने के बजाय बैंक के साथ बातचीत करना और लोन रीस्ट्रक्चरिंग (Restructuring) या पेमेंट हॉलिडे की मांग करना हमेशा बेहतर होता है।
