नई कार खरीदते वक्त डीलर से इंश्योरेंस लेना सुविधाजनक लग सकता है, लेकिन यह अक्सर महंगा साबित होता है। सही 'Insured Declared Value' (IDV) चुनकर और अपनी जरूरत के हिसाब से 'Add-ons' तय करके आप प्रीमियम पर भारी बचत कर सकते हैं। यह समझना जरूरी है कि कैशलेस रिपेयर की सुविधा किसी खास डीलर की मोहताज नहीं होती।
नई कार खरीदते समय डीलरशिप पर इंश्योरेंस का पैकेज मिलना बहुत आम है। हालांकि यह प्रक्रिया आसान लगती है, लेकिन हकीकत में आप खुले बाजार के मुकाबले अधिक प्रीमियम चुका रहे होते हैं। इसे 'डीलर इंश्योरेंस' कहा जाता है, जहाँ डीलर एक कॉर्पोरेट एजेंट के तौर पर काम करता है, जिससे अक्सर ग्राहकों को पारदर्शिता और लागत (Cost-efficiency) के मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ता है।
'कैशलेस' का सच
सेल्स टीम अक्सर यह तर्क देती है कि उनकी पॉलिसी लेने पर ही वर्कशॉप में 'कैशलेस' सर्विस मिलेगी। यह दावा पूरी तरह भ्रामक है। भारत की अधिकांश जनरल इंश्योरेंस कंपनियां पूरे देश में अधिकृत वर्कशॉप्स का नेटवर्क रखती हैं। कैशलेस सुविधा आपकी पॉलिसी के डीलर से लिए जाने पर नहीं, बल्कि कंपनी के नेटवर्क स्ट्रेंथ पर निर्भर करती है। यदि इंश्योरर का सर्विस सेंटर के साथ टाइ-अप है, तो पॉलिसी कहीं से भी ली गई हो, सुविधा समान ही रहेगी।
IDV का खेल
इंश्योरेंस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है—IDV (Insured Declared Value)। यह वह अधिकतम राशि है जो चोरी या गाड़ी के पूरी तरह डैमेज होने पर इंश्योरर चुकाता है। डीलर्स कई बार प्रीमियम कम दिखाने के लिए जानबूझकर IDV कम कर देते हैं। इससे शॉर्ट टर्म में पॉलिसी सस्ती तो लगती है, लेकिन क्लेम के समय आपको बड़ा वित्तीय नुकसान हो सकता है।
फालतू Add-ons से बचें
डीलरशिप पर अक्सर 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' पैकेज थमाया जाता है, जिसमें कई ऐसे फीचर्स होते हैं जिनकी आपको जरूरत ही नहीं। 'Zero Depreciation' कवर नई कारों के लिए जरूरी है, लेकिन 'Return to Invoice' या 'Consumables Cover' का चयन अपनी ड्राइविंग जरूरतों के अनुसार करना चाहिए।
सही फैसला कैसे लें?
अगली बार कार खरीदते समय डीलर से एक 'आइटमाइज्ड कोट' मांगें, जिसमें ओन-डैमेज प्रीमियम, थर्ड-पार्टी प्रीमियम और Add-ons अलग-अलग हों। इस जानकारी के साथ आप ऑनलाइन इंश्योरेंस पोर्टल्स पर खुद रेट्स की तुलना कर सकते हैं। इंश्योरर की प्रतिष्ठा और उनके 'क्लेम सेटलमेंट रेश्यो' को देखकर ही अपना फैसला लें।
