क्या हुआ?
जब कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी (Spouse) से मिले पैसों से प्रॉपर्टी खरीदता है, तो यह लेनदेन शुरुआत में टैक्स के लिहाज़ से तटस्थ (Tax-neutral) होता है. भारत में इनकम टैक्स एक्ट (Income Tax Act) के तहत, जीवनसाथी जैसे खास रिश्तेदारों से मिले गिफ्ट पर कोई टैक्स नहीं लगता. इसका मतलब है कि प्रॉपर्टी खरीदने के लिए मिली रकम को पाने वाले के लिए टैक्सेबल इनकम (Taxable Income) नहीं माना जाता. ऐसे में, अगर व्यक्ति की कमाई का कोई दूसरा जरिया नहीं है, तो उसे सिर्फ प्रॉपर्टी का मालिक होने के नाते इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
इनकम क्लबिंग का प्रावधान
भले ही गिफ्ट के तौर पर मिली रकम पर टैक्स न लगे, लेकिन टैक्स डिपार्टमेंट (Tax Department) ऐसी प्रॉपर्टी से होने वाली भविष्य की कमाई को अलग नज़र से देखता है. यह इनकम टैक्स एक्ट के 'इनकम क्लबिंग' (Income Clubbing) प्रावधानों के तहत आता है, खासकर सेक्शन 64 में. कानून के मुताबिक, अगर कोई संपत्ति बिना पर्याप्त कंसीडरेशन (Consideration) के जीवनसाथी को ट्रांसफर की जाती है, तो उस संपत्ति से होने वाली कोई भी आय - जैसे किराया या भविष्य में बेचने पर होने वाला मुनाफा - ट्रांसफर करने वाले (यानी पैसे देने वाले जीवनसाथी) की आय मानी जाएगी.
उदाहरण के तौर पर, अगर प्रॉपर्टी बाद में मुनाफे पर बेची जाती है, तो उस कैपिटल गेन (Capital Gain) को उस साल पति की कुल आय में जोड़ दिया जाएगा. इसी तरह, अगर प्रॉपर्टी किराए पर दी जाती है, तो उस किराए की आय पर पति की सालाना कमाई के तौर पर टैक्स लगेगा, न कि पत्नी की.
डॉक्यूमेंटेशन क्यों ज़रूरी?
यह सब टैक्स-फ्री होने के बावजूद, एक स्पष्ट रिकॉर्ड रखना बेहद अहम है. प्रॉपर्टी खरीदने जैसी किसी भी बड़ी फाइनेंशियल डील के लिए, गिफ्ट डीड (Gift Deed) मेंटेन करने की सलाह दी जाती है. यह डॉक्यूमेंट कानूनी सबूत के तौर पर काम करता है कि फंड वाकई गिफ्ट के तौर पर मिले थे. इनकम टैक्स की जांच या पूछताछ की स्थिति में, एक औपचारिक एग्रीमेंट फंड के सोर्स को साफ तौर पर दिखाने में मदद करता है.
निवेशकों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
जब आप जीवनसाथी से मिले गिफ्ट से प्रॉपर्टी खरीदने की प्लानिंग कर रहे हों, तो बाद में होने वाली संभावित टैक्स देनदारी को ध्यान में रखना ज़रूरी है. चूंकि प्रॉपर्टी से होने वाला कोई भी मुनाफा आखिर में पैसा देने वाले जीवनसाथी की आय पर ही टैक्स होगा, इसलिए टैक्स प्लानिंग की रणनीति में उनकी कुल इनकम स्लैब (Income Slab) को ध्यान में रखा जाना चाहिए. अगर वह पहले से ही हाई टैक्स ब्रैकेट में हैं, तो किराए की आय या कैपिटल गेन जुड़ने से उनका टैक्स और बढ़ सकता है. प्रॉपर्टी रखने की अवधि (Holding Period) पर नज़र रखना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रॉपर्टी बेचने पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (Long-term Capital Gains Tax) के नियम लागू हो सकते हैं.
