अगर आप पुरानी प्रॉपर्टी यानी Resale Flat खरीदने की सोच रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। बैंक अक्सर प्रॉपर्टी की मार्केट वैल्यू से कम का आंकलन करते हैं, जिससे 'वैल्यूएशन गैप' पैदा होता है और आपको अपनी जेब से ज्यादा डाउन पेमेंट देना पड़ सकता है।
सेलर के साथ तय की गई कीमत ही सब कुछ नहीं है। बैंक प्रॉपर्टी को लोन देने से पहले अपनी तरफ से एक तकनीकी मूल्यांकन (Technical Valuation) करते हैं। बैंक हमेशा सेल एग्रीमेंट की कीमत और अपनी खुद की असेसमेंट, इन दोनों में से जो कम होती है, उसी आधार पर लोन मंजूर करते हैं।
वैल्युएशन गैप (Valuation Gap) का गणित
इसे एक उदाहरण से समझें: मान लीजिए आपने प्रॉपर्टी ₹70 लाख में तय की है, लेकिन बैंक का सर्वेक्षक उसकी कीमत सिर्फ ₹60 लाख आंकता है। अगर बैंक 80% LTV (लोन-टू-वैल्यू) ऑफर करता है, तो लोन ₹60 लाख पर ही मिलेगा। इसका सीधा असर आपके बजट पर पड़ता है और बचा हुआ अंतर आपको अपनी सेविंग्स से चुकाना पड़ता है।
पुरानी बिल्डिंग और लोन की शर्तें
बैंक पुरानी इमारतों को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। 25 से 30 साल से अधिक पुरानी प्रॉपर्टीज के मामले में बैंकों का रुख सख्त होता है। ऐसी संपत्तियों पर लोन की अवधि (Tenure) कम हो सकती है, जिससे आपकी EMI का बोझ काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा, कई बैंक अब पुरानी बिल्डिंग्स के लिए स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट की मांग करते हैं। अगर ऑडिट रिपोर्ट संतोषजनक नहीं है, तो लोन रिजेक्ट भी हो सकता है।
कानूनी दस्तावेजों की अहमियत
लेन-देन में कानूनी स्पष्टता सबसे जरूरी है। टोकन अमाउंट देने से पहले ओरिजिनल सेल डीड, टाइटल चेन और एनकम्ब्रेन्स सर्टिफिकेट की बारीकी से जांच करें। कोई भी अधूरा दस्तावेज या अनधिकृत निर्माण लोन मिलने में रुकावट पैदा कर सकता है।
छुपे हुए वित्तीय खर्च
घर की कीमत के अलावा भी कई खर्च हैं। अगर डील ₹50 लाख से ज्यादा की है, तो आपको 1% TDS काटना होगा। इसके अलावा, स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन फीस और बैंक की प्रोसेसिंग फीस पर लगने वाला GST आपकी कुल लागत को बढ़ा देते हैं। बेहतर यही है कि आप किसी भी वित्तीय कमिटमेंट से पहले बैंक से प्रॉपर्टी की वैल्यूएशन करा लें।
