अचानक पैसों की जरूरत पड़ने पर FD तुड़वाना या उसके एवज में लोन लेना, एक बड़ा फैसला है। समय से पहले FD तोड़ने पर पेनल्टी और ब्याज दर में कटौती की मार पड़ती है, जबकि लोन लेने पर ब्याज का खर्च आता है। सही फैसला आपकी जरूरत की अवधि और बैंक द्वारा वसूले जाने वाले स्प्रेड पर निर्भर करता है।
जब अचानक आर्थिक जरूरत सामने आती है, तो निवेशक अक्सर अपनी Fixed Deposit (FD) को लिक्विडिटी का सबसे आसान जरिया मानते हैं। लेकिन, मैच्योरिटी से पहले इसे बंद करना हमेशा समझदारी भरा नहीं होता। अपने रिटर्न को सुरक्षित रखने के लिए यह जानना जरूरी है कि दोनों विकल्पों का असर आपकी जेब पर कैसे पड़ता है।
समय से पहले निकासी का नुकसान
मैच्योरिटी से पहले FD बंद करना एक महंगा सौदा साबित हो सकता है। RBI के नियमों के तहत, ज्यादातर बैंक प्री-मैच्योर विड्रॉल पर पेनल्टी लगाते हैं। यह पेनल्टी आपके द्वारा कमाए गए ब्याज में से काटी जाती है। सबसे बड़ी चोट तब लगती है जब बैंक आपकी ब्याज दर को उस अवधि के हिसाब से रीसेट कर देता है, जितने समय तक पैसा जमा रहा। इससे आपको मिलने वाला कुल रिटर्न 1% से 2% तक कम हो सकता है।
FD के बदले लोन का विकल्प
दूसरा रास्ता है अपनी FD को सुरक्षित रखकर उस पर लोन लेना। इस तरीके में आपका प्रिंसिपल अमाउंट बैंक में जमा रहता है और उस पर ब्याज मिलता रहता है। आमतौर पर, बैंक FD पर मिलने वाले ब्याज दर से 1% से 2% ज्यादा पर लोन देते हैं। यदि आप ओवरड्राफ्ट (Overdraft) सुविधा का विकल्प चुनते हैं, तो यह और भी किफायती हो सकता है। ओवरड्राफ्ट में आपको सिर्फ उस रकम पर ब्याज देना होता है जितने दिन आप पैसा इस्तेमाल करते हैं, न कि पूरे लोन अमाउंट पर। यह कम समय की जरूरतों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है।
समय का खेल (Duration Factor)
आपका फैसला आपकी जरूरत की अवधि पर टिकी होनी चाहिए। यदि आपको सिर्फ कुछ हफ्तों या महीनों के लिए पैसे चाहिए, तो लोन लेना सस्ता पड़ता है क्योंकि लोन का ब्याज, FD तोड़ने पर होने वाले स्थायी नुकसान से कम होता है। वहीं, अगर पैसों की जरूरत लंबे समय के लिए है, तो लोन का ब्याज धीरे-धीरे भारी पड़ सकता है।
अंतिम निर्णय लेने से पहले अपने बैंक से दोनों स्थितियों का सटीक कैलकुलेशन जरूर मांगें। प्री-मैच्योर क्लोजर पेनल्टी और लोन के ब्याज खर्च की तुलना करें। इसके साथ ही बैंक द्वारा लिए जाने वाले प्रोसेसिंग फीस को भी जोड़ना न भूलें।
