ज्यादातर कर्जदार केवल मंथली EMI पर ध्यान देते हैं और कुल ब्याज लागत को नजरअंदाज कर देते हैं। Reserve Bank of India द्वारा अनसिक्योर्ड लोन पर कड़े नियमों के बीच, सही डेट-टू-इनकम रेश्यो (Debt-to-income ratio) को समझना बेहद जरूरी है।
अक्सर लोग कर्ज लेते समय केवल यह देखते हैं कि उनकी मंथली जेब पर कितना भार पड़ेगा। हालांकि, यह नजरिया कर्ज की असली कीमत को छिपा देता है। एक तय राशि की किस्त आपके कैश फ्लो का तो पता देती है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने वह पैसा किस चीज के लिए लिया है—घर या शिक्षा जैसे एसेट बनाने के लिए या फिर शौक पूरे करने के लिए।
ब्याज का मायाजाल
सिर्फ मंथली पेमेंट के आधार पर लोन आंकने का सबसे बड़ा जोखिम 'कुल ब्याज' (Total Interest Cost) को नजरअंदाज करना है। क्रेडिट कार्ड जैसे लोन पर ब्याज दरें बहुत ज्यादा होती हैं और वे कंपाउंडिंग के जरिए मूल राशि से भी अधिक हो सकती हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल लोन कंसोलिडेशन से समस्या हल नहीं होती, जब तक कि खर्च करने की आदत में बदलाव न आए।
रेगुलेटरी माहौल और RBI की सख्ती
कंज्यूमर क्रेडिट मार्केट में स्थिरता बनाए रखने के लिए Reserve Bank of India काफी सतर्क है। अनसिक्योर्ड पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड पर RBI द्वारा रिस्क वेट बढ़ाने का सीधा मतलब है कि बैंकों को रिटेल लेंडिंग में सावधानी बरतनी होगी। मार्केट में चल रही ब्याज दरें केवल एक बेसलाइन हैं; असल ब्याज दर आपकी प्रोफाइल और रिस्क प्रीमियम के आधार पर तय होती है।
फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के लिए गोल्डन रूल
फाइनेंशियल हेल्थ को दुरुस्त रखने के लिए अपने EMI-टू-इनकम रेश्यो को 40% से कम रखना एक समझदारी भरा कदम है। यदि कर्ज का भार इससे ऊपर जाता है, तो इमरजेंसी फंड और अन्य जरूरी खर्चों के लिए पैसा कम पड़ जाता है। किसी भी नए कर्ज के जाल में फंसने से पहले एक 'डेट ऑडिट' करना जरूरी है, जिसमें प्रोसेसिंग फीस और वित्तीय बफर पर पड़ने वाले असर को शामिल करें।
