बेंगलुरु में 28 साल के एक टेक प्रोफेशनल के सामने ₹1.2 करोड़ का घर खरीदने या ₹44,000 महीना किराया देकर रहने का सवाल खड़ा है। ₹70 लाख सालाना कमाई और ₹2 करोड़ की नेट वर्थ वाले इस शख्स के सामने लिक्विडिटी, जॉब वोलेटिलिटी और घर खरीदने-किराये पर रहने की असली लागत जैसे बड़े फैसले हैं।
₹1.2 करोड़ का घर या ₹44,000 का किराया?
बेंगलुरु में एक 28 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पर्सनल फाइनेंस की यह कहानी आजकल चर्चा का विषय बनी हुई है। ₹70 लाख सालाना कमाने वाले और ₹2 करोड़ की नेट वर्थ (म्यूचुअल फंड, एफडी, सोना और स्टॉक ऑप्शन शामिल) वाले इस इंजीनियर के सामने ₹1.1 करोड़ से ₹1.25 करोड़ के फ्लैट को खरीदने या ₹44,000 प्रति माह किराया देकर रहने का बड़ा सवाल है।
प्रस्ताव यह है कि ₹40 लाख का डाउन पेमेंट किया जाए और ₹80 लाख का होम लोन लिया जाए, जिससे हर महीने ईएमआई (EMI) करीब ₹65,000 बनेगी। हालांकि यह शख्स फिलहाल कर्ज-मुक्त है और उसके पास अच्छी-खासी संपत्ति भी है, लेकिन इतने बड़े अमाउंट को एक ही रियल एस्टेट प्रॉपर्टी में फंसाने से उसकी फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी पर सवाल उठ रहे हैं।
रेंटल यील्ड और घर खरीदने की असली कीमत
गणित के हिसाब से देखें तो बेंगलुरु में ₹1.2 करोड़ की प्रॉपर्टी पर रेंटल यील्ड (Rental Yield) आमतौर पर 3% से 4.5% के बीच रहती है। ₹44,000 के मासिक किराए के हिसाब से सालाना किराया ₹5.28 लाख होता है। लेकिन ₹65,000 की ईएमआई की तुलना सिर्फ किराए से करना पूरी कहानी नहीं है। घर खरीदने पर कई छिपे हुए खर्चे भी होते हैं, जैसे रजिस्ट्रेशन फीस, स्टाम्प ड्यूटी, प्रॉपर्टी मेंटेनेंस, इंटीरियर का खर्च और फ्लोटिंग रेट होम लोन पर ब्याज दरें बढ़ने का रिस्क।
टेक सेक्टर का रिस्क और फाइनेंशियल सिक्योरिटी
इस मामले में सबसे बड़ा फैक्टर इंजीनियर की नौकरी का नेचर है। टेक सेक्टर में कमाई भले ही ज्यादा हो, लेकिन यह सेक्टर मार्केट साइकिल, रीस्ट्रक्चरिंग और छंटनी (Layoffs) के प्रति काफी संवेदनशील होता है। ज्यादा कमाने वाले के लिए भी नौकरी जाने की स्थिति में बड़े होम लोन का बोझ उठाना एक बड़ा फाइनेंशियल रिस्क है। बैंक SARFAESI एक्ट के तहत लोन डिफॉल्ट होने पर प्रॉपर्टी को जब्त कर सकते हैं। युवा प्रोफेशनल्स के लिए, म्यूचुअल फंड या एफडी में लिक्विडिटी बनाए रखना एक फाइनेंशियल बफर का काम करता है, जो डाउन पेमेंट में पैसे लगाने से खत्म हो जाता है।
लिक्विडिटी का ट्रेड-ऑफ
घर खरीदने का मतलब है कि नेट वर्थ का एक बड़ा हिस्सा लिक्विड इन्वेस्टमेंट से निकालकर एक इलिक्विड एसेट (Illiquid Asset) में लगाना। रियल एस्टेट में लंबे समय में कीमतें बढ़ सकती हैं, लेकिन यह स्टॉक या एफडी की तरह तुरंत लिक्विड नहीं होता। 28 साल की उम्र में, जब करियर और लाइफस्टाइल की जरूरतें बदल सकती हैं (जैसे ट्रांसफर, शादी या परिवार बढ़ाना), तब रेंट पर रहने से जो फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है, वह घर खरीदने पर नहीं मिलती। आखिर में, यह फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि क्या व्यक्ति अपने घर के साइकोलॉजिकल सिक्योरिटी को प्राथमिकता देता है या अपनी ₹2 करोड़ की नेट वर्थ को आसानी से एक्सेस करने की फाइनेंशियल एजिलिटी को।
