Personal Loan के लुभावने विज्ञापनों के पीछे छिपे होते हैं कई तरह के अतिरिक्त चार्जेस। RBI द्वारा अनिवार्य 'Key Facts Statement' (KFS) को समझना और लंबी अवधि के लोन के जाल से बचना आपको भविष्य के बड़े नुकसान से बचा सकता है।
KFS क्यों है जरूरी?
बैंक और NBFCs अक्सर कम ब्याज दर का लालच देकर लोन ऑफर करते हैं, लेकिन लोन की असल लागत 'Fine Print' में छुपी होती है। ग्राहकों की सुरक्षा के लिए RBI ने अब सभी रिटेल और MSME लोन के लिए Key Facts Statement (KFS) देना अनिवार्य कर दिया है। यह डॉक्यूमेंट आपको यह बताता है कि प्रोसेसिंग फीस और अन्य हिडन चार्जेस मिलाकर लोन की असल एनुअलाइज्ड कॉस्ट (Annualised Cost) क्या है। इसे पढ़े बिना साइन करना आपको भारी ब्याज के बोझ में डाल सकता है।
लंबी अवधि (Tenure) का जाल
ज्यादातर लोग छोटी EMI के चक्कर में लंबी अवधि के लिए लोन ले लेते हैं। भले ही इससे मासिक बजट पर तुरंत दबाव कम दिखे, लेकिन लंबे समय में आपको ब्याज के तौर पर बहुत बड़ी रकम चुकानी पड़ती है। उदाहरण के तौर पर, 3 साल के मुकाबले 5 साल के लोन पर ब्याज का बोझ काफी अधिक हो जाता है। हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार अधिकतम EMI चुनें, न कि केवल टेन्योर को लंबा करें।
प्रीपेमेंट और क्रेडिट स्कोर
लोन लेते समय फोरक्लोजर (Foreclosure) चार्जेस के बारे में जरूर पूछें। अच्छी बात यह है कि RBI के नियमों के अनुसार, व्यक्तिगत फ्लोटिंग-रेट पर्सनल लोन पर बैंक प्रीपेमेंट पेनल्टी नहीं ले सकते। साथ ही, बार-बार अलग-अलग लेंडर्स के पास लोन के लिए अप्लाई न करें। हर बार लोन इंक्वायरी करने पर आपका क्रेडिट स्कोर प्रभावित होता है, जिससे भविष्य में लोन मिलना मुश्किल और महंगा हो सकता है। समय पर EMI चुकाना आपके फाइनेंशियल हेल्थ के लिए सबसे जरूरी है।
