2026 के एक सर्वे के अनुसार, आधे से अधिक भारतीय निवेशक महंगाई को मात देने के लिए अब फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के बजाय पीयर-टू-पीयर (P2P) लेंडिंग जैसे वैकल्पिक निवेश की ओर रुख कर रहे हैं।
2026 में हुए एक सर्वे में 10,000 निवेशकों के डेटा से पता चला है कि भारतीय पर्सनल फाइनेंस के ट्रेंड में बड़ा बदलाव आया है। करीब 52% निवेशक अपनी पूंजी का एक हिस्सा पारंपरिक फिक्स्ड डिपॉजिट से निकालकर वैकल्पिक निवेश साधनों में लगा रहे हैं। इस बदलाव की मुख्य वजह बढ़ती महंगाई और FD पर मिलने वाले ब्याज पर लगने वाला टैक्स है।
बेहतर रिटर्न की तलाश
FD हमेशा से भारतीय घरों के लिए निवेश का सबसे सुरक्षित आधार रही है, लेकिन अब निवेशक अपने रियल रिटर्न (Real Return) को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पीयर-टू-पीयर (P2P) लेंडिंग प्लेटफॉर्म इस बदलाव के सबसे बड़े फायदेदार बनकर उभरे हैं। यहां निवेशक सीधे उधारकर्ताओं को पैसा उधार दे सकते हैं। हालांकि, बैंक की तरह यहां कोई रिटर्न की गारंटी नहीं होती, जो इसे थोड़ा रिस्की बनाता है।
रिस्क और सुरक्षा का गणित
निवेशकों के लिए इन दोनों के बीच के फर्क को समझना जरूरी है। बैंकों में जमा ₹5 लाख तक की राशि DICGC द्वारा बीमित (Insured) होती है। इसके उलट, P2P लेंडिंग में क्रेडिट रिस्क होता है, यानी अगर उधारकर्ता पैसा न लौटाए तो मूलधन डूब सकता है। सर्वे के मुताबिक, 35% निवेशक इसे FD के साथ एक सपोर्टिव एसेट क्लास मानते हैं, जबकि 13% लोग जोखिम के डर से पूरी तरह पारंपरिक FD पर ही निर्भर हैं।
टियर-2 और टियर-3 शहरों में हलचल
यह निवेश का ट्रेंड सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। सर्वे के अनुसार, पोर्टफोलियो को डाइवर्सिफाई करने वाले 62% निवेशक टियर-2 और टियर-3 शहरों से हैं, जिसे डिजिटल पहुंच ने आसान बनाया है। निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इन प्लेटफॉर्म्स को NBFC-P2P के तौर पर रेग्युलेट करता है, जिससे कुछ हद तक पारदर्शिता बनी रहती है।
फिलहाल, 35 से 50 वर्ष के प्रोफेशनल्स इस बदलाव की अगुवाई कर रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि निवेश का फैसला लेते समय अपने रिस्क एपेटाइट (Risk Appetite) और प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता की जांच करना सबसे जरूरी है।
