डिफेंसिव स्टॉक्स की ओर झुकाव
आज, 8 जून को, एशियाई बाजारों में आई बिकवाली के चलते निवेशकों ने इक्विटी से दूरी बना ली। निफ्टी 50 का 23,200 के स्तर के करीब आना, सिर्फ एक सामान्य गिरावट नहीं बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत है। मध्य पूर्व में अस्थिरता को लेकर बढ़ती चिंता के बीच, निफ्टी फार्मा इंडेक्स में 1.4% की तेजी देखी गई, जो कैपिटल प्रिजर्वेशन को प्राथमिकता देने का साफ इशारा है। Mankind Pharma और JB Chemicals जैसी कंपनियों का प्रदर्शन बताता है कि डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) बड़ी सेक्टर एक्सपोजर के बजाय, उन कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं जहाँ से कैश फ्लो की गारंटी हो।
कॉर्पोरेट खबरों का असर
सेक्टर रोटेशन के अलावा, कुछ कंपनियों की अपनी खबरों ने भी शेयर की कीमतों पर असर डाला। Zee Entertainment में तेजी देखने को मिली, जिसकी वजह 10 जून को होने वाली बोर्ड मीटिंग है। इस मीटिंग में कंपनी कैपिटल रेज़ (पूंजी जुटाना) पर चर्चा करेगी। यह तेजी कंपनी के हालिया मार्च तिमाही के ₹102.4 करोड़ के घाटे के बावजूद आई है। निवेशक मौजूदा कमजोर नतीजों से हटकर कंपनी के बैलेंस शीट को स्थिर करने पर ध्यान दे रहे हैं, हालांकि इस अनिश्चित माहौल में प्राइवेट प्लेसमेंट की सफलता पर अभी संशय बना हुआ है। इसी तरह, Reliance Infrastructure का शेयर लगातार छह दिनों से अपर सर्किट पर है। यह तेजी इंसॉल्वेंसी रिव्यू पिटीशन (दिवालियापन समीक्षा याचिका) से जुड़ी है, लेकिन एक हफ्ते में 33% का उछाल, फंडामेंटल क्वालिटी में बदलाव के बजाय सट्टेबाजी की ओर इशारा करता है।
संभावित जोखिम
मिड-कैप और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई शेयरों में मौजूदा तेजी में बड़ा एग्जीक्यूशन रिस्क (कार्यान्वयन जोखिम) है। Zee Entertainment के मामले में, पिछले रेगुलेटरी जांच और लगातार तिमाही मुनाफे में कंपनी की विफलता को देखते हुए, किसी भी नए इक्विटी डाइल्यूशन (शेयरों की संख्या बढ़ाना) पर सावधानी बरतना ज़रूरी है। कन्वर्टिबल सिक्योरिटीज के जरिए फंड जुटाना उन कंपनियों के लिए एक अस्थायी उपाय हो सकता है जो लिक्विडिटी के दबाव का सामना कर रही हैं, और अगर ऑपरेशनल सुधार नहीं होते हैं तो यह शेयरधारकों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसके अलावा, Tech Mahindra और Mphasis जैसी IT कंपनियों में भी ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स में अनिश्चितता के चलते दबाव बना रह सकता है। अगर पश्चिमी देशों के क्लाइंट्स टेक्नोलॉजी पर खर्च कम करते हैं, तो इन कंपनियों के लिए अपने मौजूदा वैल्यूएशन को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
आगे क्या?
डिफेंसिव ट्रेंड का जारी रहना इस बात पर निर्भर करेगा कि KOSPI की अगुवाई वाली कमजोरी इमर्जिंग मार्केट्स में और फैलती है या नहीं। अगर BSE सेंसेक्स 73,700 के स्तर को बनाए रखने में नाकाम रहता है, तो स्टॉप-लॉस ट्रिगर होने से बिकवाली और बढ़ सकती है। ब्रोकरेज फर्मों का मानना है कि डिफेंसिव स्टॉक्स भले ही थोड़ी सुरक्षा दे रहे हों, लेकिन भारतीय इक्विटीज़ का वैल्यूएशन ऐतिहासिक रूप से महंगा बना हुआ है, जिससे किसी भी मैक्रोइकोनॉमिक या जियोपॉलिटिकल स्थिति के बिगड़ने पर नुकसान की गुंजाइश कम रह जाती है।
