यह बात सामने आई है कि कंपनियों द्वारा बनाई गई वेलनेस (Well-being) पॉलिसीज़ और कर्मचारियों द्वारा असलियत में अनुभव की जा रही हकीकत में बड़ा अंतर है। एक सर्वे में **42%** कर्मचारियों ने माना कि उनके संस्थान इन नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करने में नाकाम रहे हैं। 'ऑलवेज-ऑन' यानी हमेशा काम के लिए उपलब्ध रहने का दबाव कर्मचारियों के लिए तनाव का एक बड़ा कारण बनकर उभरा है।
'हमेशा ऑन' कल्चर का भारी तनाव
सर्वे 'Beyond the Policy: Lived Experience and Micro-Rituals in Employee Wellbeing' के अनुसार, 1,884 कर्मचारियों में से 42% को लगता है कि उनके मालिक वेलनेस प्रोग्राम को ठीक से लागू नहीं करते। रिपोर्ट बताती है कि कंपनियाँ भले ही बड़े-बड़े वेलनेस प्रोग्राम का प्रचार करती हों, लेकिन ये अक्सर उन मुख्य समस्याओं को हल नहीं कर पाते जिनसे कर्मचारियों को रोज़ाना जूझना पड़ता है।
'ऑलवेज-ऑन' वर्क कल्चर को तनाव का सबसे बड़ा कारण बताया गया है, जिसका असर 42% कर्मचारियों पर पड़ रहा है। लगातार उपलब्ध रहने की यह उम्मीद, जो अक्सर डिजिटल कनेक्टिविटी से बढ़ती है, वेलनेस नीतियों के असली फायदे को कम कर रही है। इसके अलावा, 21% कर्मचारियों ने बताया कि अवास्तविक डेडलाइन और अत्यधिक दबाव वाली उम्मीदें इस समस्या को और बढ़ा रही हैं। इससे यह साफ है कि काम के रोज़मर्रा के तरीकों में बदलाव लाए बिना, मेडिटेशन ऐप या जिम मेंबरशिप जैसे फॉर्मल प्रोग्राम्स से कर्मचारी के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार मुश्किल है।
कर्मचारियों के लिए क्या ज़रूरी है?
सर्वे से पता चलता है कि कर्मचारी भरोसे (Trust) और सशक्तिकरण (Empowerment) को बहुत महत्व देते हैं। 52% कर्मचारियों ने इन्हें अपनी खुशहाली का सबसे बड़ा ज़रिया बताया। वहीं, 47% कर्मचारियों का मानना है कि सहानुभूतिपूर्ण मैनेजमेंट (Empathetic Management) ही उन्हें तनाव या बर्नआउट पर बात करने के लिए सहज महसूस कराता है। सिर्फ कुछ आसान बदलाव, जैसे काम का उचित बंटवारा (जिसे 36% कर्मचारियों ने प्राथमिकता दी) और सार्थक पहचान (Recognition), जटिल वेलनेस लाभों से कहीं ज़्यादा असरदार साबित हुए हैं। इससे लगता है कि काम के तनाव का हल केवल HR की नीतियों में नहीं, बल्कि मैनेजमेंट के तरीकों और टीम कल्चर में भी छुपा है।
निवेशकों के लिए क्यों ज़रूरी है यह?
निवेशकों और मार्केट एनालिस्ट के लिए, कर्मचारियों का प्रभावी मैनेजमेंट अब सिर्फ HR का मामला नहीं रहा। यह एक महत्वपूर्ण ऑपरेशनल हिस्सा है जो सीधे कंपनी के मुनाफे (Bottom Line) को प्रभावित करता है। कर्मचारियों का ज़्यादा तनाव और खराब कंपनी कल्चर अक्सर ज़्यादा टर्नओवर रेट (Turnover Rate) से जुड़ा होता है। जब कोई कंपनी अनुभवी कर्मचारियों को खोती है, तो भर्ती, ऑनबोर्डिंग और ट्रेनिंग में भारी खर्च आता है, जो समय के साथ मुनाफे को कम कर सकता है।
इसके अलावा, प्रोडक्टिविटी (Productivity) सीधे तौर पर कर्मचारियों की मानसिक सेहत से जुड़ी है। बर्नआउट वाला माहौल कम आउटपुट, ज़्यादा एब्सेंटीज़्म (Absenteeism) और गलतियों का कारण बन सकता है, जो कंपनी के लंबे समय के प्रदर्शन के लिए जोखिम पैदा करते हैं। हाल के वर्षों में, ESG (Environmental, Social, and Governance) रिपोर्टिंग में सामाजिक कारकों, जैसे कर्मचारी कल्याण और रिटेंशन (Retention), पर ध्यान बढ़ा है। जो कंपनियाँ अपनी बताई गई नीतियों और कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति के बीच के अंतर को पाट पाती हैं, वे स्थिर प्रोडक्टिविटी बनाए रखने और लागतों को नियंत्रित करने की बेहतर स्थिति में हो सकती हैं।
निवेशक भविष्य की तिमाही अपडेट्स में मैनेजमेंट द्वारा कल्चर और रिटेंशन को दी जाने वाली प्राथमिकता पर नज़र रख सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या कंपनियाँ विकास बनाए रखते हुए अपने कर्मचारियों को बनाए रख पाती हैं, क्योंकि उच्च कर्मचारी छोड़ने की दर (Attrition) अक्सर आंतरिक तनाव या कल्चरल मिसअलाइनमेंट का एक पिछड़ा हुआ संकेत (Lagging Indicator) होती है।
