कंपनियां अक्सर टेक्निकल स्टाफ को बिना लीडरशिप स्किल्स परखे मैनेजर बना देती हैं। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा रिस्क है, क्योंकि इससे कंपनी की परफॉर्मेंस और प्रोडक्टिविटी पर सीधा असर पड़ता है।
कॉर्पोरेट फाइनेंस की दुनिया में निवेशक अक्सर रेवेन्यू, प्रॉफिट मार्जिन और कर्ज के आंकड़ों पर ही ध्यान देते हैं। लेकिन, शेयरहोल्डर वैल्यू के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर नजरअंदाज हो जाता है: वह है लीडरशिप की क्षमता। कई बार कंपनियां 'पीटर प्रिंसिपल' (Peter Principle) का शिकार हो जाती हैं, जहां टेक्निकल एक्सपर्ट्स को मैनेजमेंट रोल में डाल दिया जाता है, बिना यह देखे कि उनमें लीडरशिप क्वालिटी है या नहीं।
रिस्क का बड़ा आंकड़ा
Gallup की रिसर्च के अनुसार, लगभग 82% मामलों में कंपनियां उन लोगों को मैनेजर चुन लेती हैं जिनमें सही लीडरशिप क्षमता का अभाव होता है। निवेशकों के लिए यह सिर्फ HR का मुद्दा नहीं, बल्कि 'एग्जीक्यूशन रिस्क' (Execution Risk) है। जब मैनेजर टीम को लीड नहीं कर पाते, तो कर्मचारियों का मनोबल गिरता है और टैलेंट कंपनी छोड़कर जाने लगता है।
मुनाफे पर कैसे पड़ता है असर?
इसका असर तुरंत बैलेंस शीट पर नहीं दिखता, लेकिन कुछ ही तिमाही (Quarters) में इसके परिणाम सामने आने लगते हैं। सीनियर टेक्निकल स्टाफ के जाने से कंपनी का ज्ञान (Institutional Knowledge) खत्म होता है, नई चीजों की खोज (Innovation) रुक जाती है और प्रोजेक्ट्स में देरी होने लगती है। यह सब कंपनी की ग्रोथ और मार्जिन पर गुप्त दबाव (Hidden Pressure) की तरह काम करता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
इन्वेस्टर्स को एनुअल रिपोर्ट्स और मैनेजमेंट कमेंट्री में लीडरशिप की स्थिरता के सुराग ढूंढने चाहिए। अगर कंपनी में लगातार बड़े पदों पर बदलाव हो रहे हैं, तो यह खतरे की घंटी है। एक मजबूत मैनेजमेंट पाइपलाइन ही कंपनी की भविष्य की सफलता और रणनीतिक लक्ष्यों (Strategic Goals) को हासिल करने की क्षमता का असली पैमाना है।
