कोलकाता के स्कूलों में मिड-डे मील का बदला मेन्यू: अब अंडा नहीं, ISKCON को मिली जिम्मेदारी

OTHER
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
कोलकाता के स्कूलों में मिड-डे मील का बदला मेन्यू: अब अंडा नहीं, ISKCON को मिली जिम्मेदारी

पश्चिम बंगाल सरकार ने कोलकाता के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में मिड-डे मील (Mid-Day Meal) स्कीम में बड़ा बदलाव किया है। अब बच्चों को इस्कॉन (ISKCON) की ओर से शाकाहारी भोजन परोसा जाएगा और मेन्यू से अंडा हटा दिया गया है। सरकार ने प्रति छात्र बजट बढ़ाकर ₹10 कर दिया है, लेकिन पोषण संबंधी विकल्पों के कम होने और स्थानीय सप्लायर्स पर असर को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं।

क्या हुआ?

पश्चिम बंगाल सरकार ने कोलकाता नगर निगम (KMC) इलाके के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में मिड-डे मील (Mid-Day Meal) प्रोग्राम में एक अहम बदलाव की घोषणा की है। राज्य ने इस्कॉन (International Society for Krishna Consciousness) के साथ साझेदारी की है, जो अब पका हुआ भोजन उपलब्ध कराएगा और यह भोजन पूरी तरह से शाकाहारी होगा। इस बदलाव के चलते, स्कूल के मेन्यू से अंडा हटा दिया गया है, जो पहले हफ्ते में एक बार दिया जाता था। इस्कॉन के अनुसार, नए शाकाहारी मेन्यू में पनीर, राजमा, सोयाबीन और दाल जैसी प्रोटीन युक्त चीजों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

बजट और पॉलिसी में बदलाव

इस बदलाव के साथ ही, राज्य सरकार ने मिड-डे मील के लिए प्रति छात्र मटेरियल कॉस्ट आवंटन (material cost allocation) में भी बढ़ोतरी की है। वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने बजट प्रस्तुति के दौरान बताया कि प्रति छात्र आवंटन ₹6.78 से बढ़ाकर ₹10 कर दिया गया है। इस वित्तीय समायोजन का उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले पके हुए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। सरकार का कहना है कि ये शाकाहारी विकल्प अंडे से मिलने वाले पोषण मानकों को पूरा करने या उससे बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम हैं।

पोषण और विचारधारा पर बहस

इस फैसले ने कई हितधारकों के बीच सार्वजनिक बहस छेड़ दी है। एक ओर, राज्य सरकार और नियुक्त भोजन प्रदाता का तर्क है कि शाकाहारी आहार पूरी तरह से पौष्टिक हो सकता है और नया मेन्यू आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आहार विशेषज्ञों (dietitians) द्वारा तैयार किया गया है। वहीं, विपक्षी दलों और आलोचकों का कहना है कि अंडे को हटाने से बच्चों को प्रोटीन का एक परिचित, किफायती और आसानी से उपलब्ध स्रोत नहीं मिल पाएगा। यह चिंताएं भी उठाई गई हैं कि इस कदम से विविध छात्र आबादी पर एक विशेष आहार प्राथमिकता थोपी जा रही है, जिनमें से कई मांसाहारी भोजन के आदी हैं।

मौजूदा सप्लाई सिस्टम पर असर

इस बदलाव का मिड-डे मील इकोसिस्टम पर भी असर पड़ेगा। ऐतिहासिक रूप से, भारत में कई स्कूल भोजन कार्यक्रम स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups - SHGs) और सामुदायिक संगठनों पर निर्भर करते रहे हैं। इस मॉडल ने स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का समर्थन किया है। कोलकाता के स्कूलों के लिए एक बड़े धार्मिक संगठन के साथ केंद्रीकृत साझेदारी (centralized partnership) परिचालन मॉडल में एक बदलाव का संकेत देती है। यह अभी देखना बाकी है कि यह बदलाव पहले भोजन तैयार करने में लगे SHGs की भूमिका और आजीविका को कैसे प्रभावित करेगा।

निवेशकों और पर्यवेक्षकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

राज्य के सार्वजनिक व्यय और सामाजिक नीतियों पर नजर रखने वालों के लिए, मुख्य निगरानी बिंदु कार्यान्वयन की समय-सीमा और नए मेन्यू के दीर्घकालिक पोषण संबंधी परिणाम होंगे। पर्यवेक्षक यह देखेंगे कि क्या प्रति छात्र ₹10 का बढ़ा हुआ बजट स्कूल उपस्थिति और छात्रों के वजन/विकास जैसे स्वास्थ्य मेट्रिक्स को प्रभावी ढंग से बनाए रखता है या सुधारता है। इसके अतिरिक्त, KMC क्षेत्र में मांग को पूरा करने के लिए केंद्रीकृत रसोई मॉडल की परिचालन सफलता नई नीति के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी। स्थानीय बनाम केंद्रीकृत आपूर्तिकर्ताओं की भागीदारी के संबंध में कोई भी आगे का विकास स्थानीय समुदाय पर आर्थिक प्रभाव को समझने के लिए भी प्रासंगिक होगा।

Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.