पश्चिम बंगाल में ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) को काबू करने के लिए प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मस्जिदों और मंदिरों से लगभग **1,500** लाउडस्पीकर हटाए गए हैं। इस ड्राइव को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ गई है और नियमों के संचालन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों की मांग की जा रही है।
पश्चिम बंगाल में ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) के नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान ने राजनीतिक और सामाजिक माहौल में हलचल मचा दी है। 6 अगस्त 2026 तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य के अधिकारियों ने मस्जिदों से 1,279 और मंदिरों से 199 लाउडस्पीकर हटाए हैं। यह कार्रवाई इसलिए की जा रही है ताकि धार्मिक स्थलों पर दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की ध्वनि सीमा का पालन सुनिश्चित हो सके, जो कि न्यायिक दिशानिर्देशों के तहत तय की गई है।
हालांकि, ध्वनि प्रदूषण के नियमों का पालन कराना एक उद्देश्य है, लेकिन जिस तरह से यह कार्रवाई की जा रही है, वह विवाद का विषय बन गई है। धार्मिक नेताओं और विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई है कि पुलिसकर्मी केवल मौखिक आदेश दे रहे हैं, न कि औपचारिक लिखित नोटिस। प्रक्रियात्मक स्पष्टता की इस कमी के कारण यह आरोप लगाया जा रहा है कि नियमों को मनमाने ढंग से लागू किया जा रहा है। इसी के चलते, सभी धार्मिक निकायों के लिए एक पारदर्शी मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure - SOP) बनाने की मांग उठ रही है।
इस मुद्दे ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर इस मामले पर चर्चा की। सांसदों ने धार्मिक स्वतंत्रता और नियमों को लागू करने में संतुलन की आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की। वहीं, राज्य स्तर पर, इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के विधायक नpwd सिद्दीकी (Nawsad Siddiqui) ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (Director-General of Police) को पत्र लिखा है। सिद्दीकी ने कानूनी स्पष्टता मांगी है और अधिकारियों से उचित प्रक्रिया का पालन करने का आग्रह किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इस ड्राइव को अधिक संवेदनशीलता से नहीं संभाला गया, तो यह सामाजिक अशांति का कारण बन सकती है।
वहीं, राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा है कि यह कानून बनाए रखने के लिए एक आवश्यक कदम है। पार्टी का कहना है कि ध्वनि प्रदूषण नियमों को समान रूप से लागू किया जाना चाहिए और इसमें किसी भी तरह का पक्षपात नहीं हो रहा है। उनका कहना है कि पर्यावरण मानकों का पालन करना शासन का मामला है और इसे राजनीतिक रंग नहीं देना चाहिए।
जनता और स्थानीय समुदाय के नेताओं के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि लाउडस्पीकर हटाने के आदेशों के संबंध में कोई औपचारिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है। जब तक कोई कानूनी हस्तक्षेप या स्पष्ट प्रशासनिक नीति नहीं आती, तब तक सबकी नजरें इस बात पर रहेंगी कि राज्य सरकार मौजूदा मौखिक निर्देशों को बदलने के लिए कोई लिखित सर्कुलर जारी करती है या नहीं। यदि एक स्पष्ट नीतिगत ढांचा पेश किया जाता है, तो ध्वनि सीमा लागू करने को लेकर चल रही अस्पष्टता को दूर करने और धार्मिक संगठनों द्वारा उठाई गई प्रक्रियात्मक शिकायतों को हल करने में मदद मिल सकती है।
