West Bengal में 'Food Safety Week' के दौरान **1,730** से ज्यादा रेस्टोरेंट्स की जांच हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि करीब **88%** जगहों पर नियम कायदों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। इस सख्ती से अब हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल सरकार ने 1 सितंबर से 7 सितंबर, 2026 तक चले 'Food Safety Week' अभियान के तहत बड़े पैमाने पर छापेमारी की है। कोलकाता से लेकर जलपाईगुड़ी तक फैले इस अभियान में 1,730 से ज्यादा ठिकानों को खंगाला गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1,525 प्रतिष्ठानों में गंभीर खामियां पाई गईं, जिनमें खाने के लिए असुरक्षित रंग, खराब हाइजीन और एक्सपायर्ड मीट-डेयरी का इस्तेमाल मुख्य रूप से शामिल है।
हॉस्पिटैलिटी ऑपरेशंस पर असर
प्रशासन ने इस बार चेतावनी के बजाय सीधे लाइसेंस रद्द करने और कई आउटलेट्स को सील करने की कार्रवाई की है। रेस्टोरेंट ऑपरेटर्स के लिए यह अचानक आए बड़े ऑपरेशनल रिस्क की तरह है। अब इन कंपनियों को न सिर्फ राजस्व (Revenue) के नुकसान से जूझना पड़ेगा, बल्कि सफाई, स्टाफ ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड पर भारी खर्च करना होगा ताकि वे फिर से संचालन शुरू कर सकें।
फाइनेंशियल और स्ट्रैटेजिक रिस्क
त्योहारी सीजन (Festive Season) सिर पर है, ऐसे में इस तरह की निगेटिव पब्लिसिटी सीधे फुटफॉल और कमाई को प्रभावित कर सकती है। राज्य सरकार ने संकेत दिए हैं कि यह कोई एक बार की कार्रवाई नहीं है, बल्कि एक नई रणनीति है। इसका मतलब है कि भविष्य में अनुपालन लागत (Compliance Costs) बढ़ेगी, जिससे कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव दिख सकता है।
साथ ही, FSSAI भी देशभर में नॉन-कंप्लायंट फूड प्रोसेसिंग कंपनियों पर नकेल कस रहा है। निवेशकों को सलाह है कि वे अब केवल प्रॉफिट ग्रोथ न देखें, बल्कि कंपनियों के क्वालिटी कंट्रोल और रेगुलेटरी ऑडिट्स पर भी नजर रखें, क्योंकि खराब हाइजीन अब सीधा बैलेंस शीट पर असर डाल सकती है।
