उत्तर भारत में 14-15 अक्टूबर को फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले तूफान का खतरा मंडरा रहा है, जबकि दक्षिण भारत में कमजोर मानसून के बाद अब उत्तर-पूर्वी मानसून का इंतजार है। यह अस्थिरता ग्रामीण आय, फूड इन्फ्लेशन और ग्रामीण कर्ज देने वाले बैंकों के लिए रिस्क बढ़ा सकती है।
उत्तर भारत के दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ में मौसम ने अचानक करवट ली है। 14 से 15 अक्टूबर के बीच 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं और गरज के साथ छींटे पड़ने की आशंका है। पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) के चलते ओलावृष्टि का भी खतरा है, जो बागवानी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं दूसरी ओर, दक्षिण भारत में अगले 48 से 72 घंटों में उत्तर-पूर्वी मानसून शुरू होने की उम्मीद है।
ग्रामीण मांग और महंगाई का रिस्क
भारत में साउथवेस्ट मानसून सीजन 13% की कमी के साथ खत्म हुआ है। दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में 2001 के बाद यह दूसरी सबसे कम बारिश रही। वर्तमान में दक्षिणी राज्यों के जलाशयों का स्तर महज 49% है, जो पिछले साल इसी समय 88% था। निवेशकों के लिए यह दोहरी चिंता है: पहली, फसल खराब होने से फूड इन्फ्लेशन का बढ़ना और दूसरी, रूरल डिमांड में गिरावट आना।
लेंडर्स (Lenders) पर क्या असर होगा?
मौसम की यह अस्थिरता सीधे तौर पर उन बैंकों और NBFCs को प्रभावित करती है, जिनका रूरल लोन, ट्रैक्टर लोन या माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो बड़ा है। मानसून की बेरुखी से किसानों की आय प्रभावित होती है, जिससे कर्ज चुकाने की क्षमता कम हो जाती है। हालांकि, NCDEX ने 'RAINCHNNAI' वेदर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स लॉन्च किए हैं, जो इस तरह के वित्तीय जोखिमों से बचने में मदद कर सकते हैं, लेकिन पूरा सेक्टर अभी भी कृषि उत्पादन पर निर्भर है।
आने वाले हफ्ते रबी (Rabi) की बुवाई के लिए बेहद अहम होंगे। निवेशकों को अब बारिश के डेटा, जलाशय के स्तर और फूड इन्फ्लेशन की रिपोर्ट्स पर पैनी नजर रखनी होगी, क्योंकि यही ग्रामीण खपत और रूरल-फोक्स्ड लेंडर्स की सेहत तय करेंगे।
