ऑफ-कैंपस हायरिंग का बोलबाला! भारत की जॉब मार्केट में आया बड़ा बदलाव, अब डिग्री से ज्यादा स्किल्स को अहमियत

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
ऑफ-कैंपस हायरिंग का बोलबाला! भारत की जॉब मार्केट में आया बड़ा बदलाव, अब डिग्री से ज्यादा स्किल्स को अहमियत

आजकल भारत की जॉब मार्केट में फ्रेशर्स के लिए बड़े-बड़े ऑफ-कैंपस जॉब ऑफर की चर्चाएं ज़ोरों पर हैं। यह दिखाता है कि अब कंपनियां सिर्फ कॉलेज की डिग्री से ज्यादा, कैंडिडेट के स्किल्स और प्रैक्टिकल अनुभव को महत्व दे रही हैं। इस बदलाव से कॉर्पोरेट जगत की प्राथमिकताएं बदल रही हैं, जहां इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट पोर्टफोलियो का महत्व कॉलेज के नाम से भी बढ़ गया है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये हाई-सैलरी वाली कहानियां इक्का-दुक्का ही हैं और नौकरी का बाजार अभी भी काफी कॉम्पिटिटिव है।

स्किल्स-बेस्ड हायरिंग की ओर बढ़ता रुझान

हाल के दिनों में, भारत के जॉब मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। टियर-3 शहर के एक ऐसे स्टूडेंट की कहानी वायरल हो रही है जिसने बिना किसी कैंपस प्लेसमेंट के, खुद के दम पर मोटी एनुअल सैलरी वाली जॉब हासिल की है। यह दिखाता है कि बड़ी और स्थापित कंपनियां अब कैंडिडेट्स की टेक्निकल स्किल्स और इंटर्नशिप जैसे प्रैक्टिकल अनुभव को, उनके कॉलेज की प्रतिष्ठा से ज्यादा महत्व दे रही हैं।

कॉर्पोरेट इंडिया में टैलेंट पहचानने का तरीका बदल रहा है। हायरिंग मैनेजर्स अब सिर्फ टॉप-टियर संस्थानों से होने वाले कैंपस प्लेसमेंट पर निर्भर नहीं हैं। वे ऐसे कैंडिडेट्स को ढूंढ रहे हैं जो प्री-प्लेसमेंट ऑफर (PPOs), स्पेशल इंटर्नशिप और मजबूत प्रोजेक्ट पोर्टफोलियो के ज़रिए तुरंत काम शुरू कर सकें। इससे कंपनियों का ट्रेनिंग कॉस्ट कम होता है और ऐसे लोगों को हायर करने का रिस्क भी घटता है जिनके पास फील्ड का अनुभव नहीं है।

निवेशकों के लिए, खासकर एजुकेशन और ह्यूमन रिसोर्स सेक्टर में, यह एक संभावित डिसरप्शन का संकेत है। जो एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस इंडस्ट्री से जुड़े प्रैक्टिकल लर्निंग पर ध्यान नहीं देंगे, उनका वैल्यू कम हो सकता है। छात्र अब अपना करियर शुरू करने के लिए बाहरी सर्टिफिकेशन्स और गिग-स्टाइल इंटर्नशिप पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।

संस्थानों की विश्वसनीयता पर सवाल?

इस बदलाव ने एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की भूमिका पर भी एक कंट्रोवर्सी खड़ी कर दी है। जब इंडिपेंडेंट स्टूडेंट्स ऑफ-कैंपस एफर्ट्स से सफल होते हैं, तो कॉलेज अक्सर मार्केटिंग में इसका क्रेडिट लेने की कोशिश करते हैं। जनता इस बात को शक की निगाह से देख रही है। इससे एक ट्रांसपेरेंसी इश्यू खड़ा हो गया है। ऐसे संस्थान जो कुछ असाधारण, सेल्फ-टॉट स्टूडेंट्स की सफलता के आधार पर अपने प्लेसमेंट आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं, वे अपनी रेपुटेशन के रिस्क पर हैं। अब स्टूडेंट्स और रिक्रूटर्स, दोनों ही करियर आउटकम्स की क्लियर रिपोर्टिंग की उम्मीद कर रहे हैं।

फ्रेशर्स के लिए मार्केट की सच्चाई

हालांकि, ये हाई-सैलरी, ऑफ-कैंपस ऑफर मीडिया का ध्यान खींचते हैं, लेकिन इन्हें ब्रॉडर इकोनॉमिक माहौल के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण है। फ्रेशर्स के लिए मौजूदा हायरिंग मार्केट ग्लोबल डिमांड ट्रेंड्स और कंपनी की कॉस्ट-ऑप्टिमाइजेशन स्ट्रैटेजीज के प्रति संवेदनशील है। हाल के इंडस्ट्री साइकल्स में PPO कैंसलेशन और सैलरी एडजस्टमेंट के मामले भी देखे गए हैं, जो बताते हैं कि जॉब मार्केट एक जैसा नहीं है।

कैंडिडेट्स और ऑब्जर्वर्स को इन वायरल सैलरी फिगर्स को 'एक्सेप्शन' मानना चाहिए, 'नॉर्म' नहीं। मौजूदा ट्रेंड यह बताता है कि भले ही कॉलेज की डिग्री का महत्व कम हो रहा है, लेकिन हाई-लेवल स्किल, एडैप्टेबिलिटी और ग्रिट की ज़रूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। आने वाले समय में, वे कैंडिडेट्स सफल होंगे जो 'डू-इट-योरसेल्फ' माइंडसेट दिखाते हैं, लेकिन कॉर्पोरेट हायरिंग बजट में वोलेटिलिटी एक महत्वपूर्ण फैक्टर बनी रहेगी जिसे जॉब मार्केट पर नज़र रखने वालों को मॉनिटर करना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.