एक अमेरिकी उद्यमी ने भारतीय वर्कर को सिर्फ कमीशन के आधार पर नौकरी दी है। यह मॉडल, जिसमें कर्मचारी को **20%** प्रॉफिट मिलता है, हर महीने **$5,000** (लगभग **₹4.7 लाख**) की कमाई करा रहा है, लेकिन इस पर सवाल भी उठ रहे हैं।
ये है वायरल हायरिंग मॉडल!
अमेरिकी उद्यमी मिकी हार्डी (Mickey Hardy) का एक सोशल मीडिया पोस्ट आजकल खूब चर्चा में है। उन्होंने एक भारतीय जॉब सीकर को नौकरी पर रखा है, जो पूरी तरह से कमीशन-आधारित कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहा है। हार्डी के मुताबिक, यह वर्कर अब हर महीने लगभग $5,000 यानी करीब ₹4.7 लाख कमा रहा है। दरअसल, यह कर्मचारी सीधे तौर पर जो भी प्रॉफिट 20% जनरेट करता है, वह उसी का हकदार होता है।
बिजनेस के लिए 'ईट व्हाट यू किल' मॉडल
यह मॉडल 'परफॉरमेंस-लिंक्ड कंपनसेशन' या 'ईट व्हाट यू किल' (Eat What You Kill) का एक उदाहरण है। इसमें कंपनी को फिक्स्ड सैलरी का बोझ नहीं उठाना पड़ता और सारा रिस्क कर्मचारी पर चला जाता है। कंपनियों के लिए यह कॉस्ट कटिंग का एक बढ़िया तरीका है, खासकर मीडिया और सेल्स जैसे सेक्टर में। वहीं, टैलेंटेड लोगों के लिए इसमें कमाई की कोई सीमा नहीं है, बशर्ते वे अच्छा परफॉरमेंस दे सकें।
श्रम के मोर्चे पर चिंताएं
हालांकि, इस मॉडल की काफी आलोचना भी हो रही है। आलोचकों का कहना है कि 'फ्री में काम करके स्किल दिखाने' का यह ट्रेंड खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है। इससे कमजोर जॉब सीकर्स का शोषण हो सकता है, जो शायद उचित वेतन मांगने की स्थिति में न हों। साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि क्या ऐसे अरेंजमेंट लोकल लेबर कानूनों, जैसे मिनिमम वेज एक्ट, का उल्लंघन करते हैं, खासकर जब इंटर्न या एंट्री-लेवल वर्कर्स शामिल हों।
ग्लोबल गिग इकोनॉमी का असर
यह मामला ग्लोबल गिग इकोनॉमी और रिमोट आउटसोर्सिंग के बढ़ते चलन को भी दर्शाता है। कंपनियां लागत कम करने के तरीके ढूंढ रही हैं, और फिक्स्ड सैलरी से हटकर वेरिएबल, परफॉरमेंस-आधारित पेमेंट मॉडल फ्रीलांस और रिमोट वर्क सेक्टर में आम हो रहे हैं। यह कंपनियों के लिए जहां एफिशिएंसी बढ़ाता है, वहीं कर्मचारियों के लिए कमाई में अनिश्चितता लाता है।
आगे क्या?
इस मॉडल की असल टिकाऊपन (Sustainability) ही आगे चलकर पता चलेगी। हालांकि, हाई-परफॉरमेंस वाले कर्मचारी इसमें सफल हो सकते हैं, लेकिन हाई एट्रिशन रेट, कानूनी चुनौतियां और ब्रांड की प्रतिष्ठा को लेकर जोखिम भी बने रहेंगे। अब देखना यह होगा कि रेगुलेटरी बॉडीज और कॉर्पोरेट HR पॉलिसीज इस तरह के नॉन-ट्रेडिशनल, कमीशन-ओनली लेबर एग्रीमेंट्स पर कैसे प्रतिक्रिया देती हैं।
