उत्तराखंड सरकार ने राज्य में गुटखा और तंबाकू युक्त खाद्य पदार्थों की बिक्री, उत्पादन और वितरण पर तत्काल प्रभाव से **1 साल** के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य को देखते हुए लिया गया यह कदम तंबाकू उद्योग के लिए नई नियामक चुनौती बनकर उभरा है।
सरकार का सख्त आदेश
खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन (FSDA) के कमिश्नर विनय शंकर पांडे द्वारा जारी आदेश के अनुसार, राज्य में अब किसी भी ऐसे खाद्य पदार्थ का निर्माण, भंडारण या बिक्री नहीं हो सकेगी जिसमें तंबाकू या निकोटीन का इस्तेमाल हुआ है। यह पाबंदी तत्काल प्रभाव से पूरे राज्य में लागू कर दी गई है।
कानूनी आधार
यह फैसला Food Safety and Standards Act, 2006 और इसके 2011 के रेगुलेशन 2.3.4 के तहत लिया गया है। यह कानून राज्य सरकारों को यह अधिकार देता है कि वे सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा होने पर किसी भी खाद्य वस्तु की बिक्री पर रोक लगा सकें। गौर करने वाली बात यह है कि उत्तराखंड ने 2013, 2015 और 2019 में भी इसी तरह के कड़े कदम उठाए थे।
मार्केट और निवेशकों पर असर
इस बैन से तंबाकू और पान मसाला सेक्टर की कंपनियों पर ESG संबंधी दबाव बढ़ना तय है। विशेषज्ञों का मानना है कि:
- छोटी कंपनियों पर मार: बड़ी कंपनियों के पास तो विविध पोर्टफोलियो होता है, लेकिन छोटी और असंगठित कंपनियां, जो मुख्य रूप से क्षेत्रीय बाजारों पर निर्भर हैं, उन्हें भारी नुकसान हो सकता है।
- ** enforcement चुनौतियां:** अतीत में देखा गया है कि ऐसे प्रतिबंधों के बाद अक्सर अवैध व्यापार (Illicit trade) पनपने की आशंका रहती है।
- निवेशकों के लिए चेतावनी: इस सेक्टर में निवेशकों को अब कंपनियों की रेगुलेटरी कंप्लायंस और सप्लाई चेन पर कड़ी नजर रखनी होगी, क्योंकि राज्य स्तर पर इस तरह की पाबंदियां कारोबार में भारी अनिश्चितता पैदा कर देती हैं।
