अमेरिकी शेयर बाजार लगातार तीसरे दिन गिरावट के साथ बंद हुए। 18 अगस्त 2026 को बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) में आई जबरदस्त तेजी और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने निवेशकों को डरा दिया। खास तौर पर टेक शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली।
टेक शेयरों में भारी बिकवाली
18 अगस्त 2026 को अमेरिकी शेयर बाजारों में लगातार तीसरे दिन गिरावट दर्ज की गई। टेक-हैवी Nasdaq इंडेक्स में करीब 1.3% से 1.8% की गिरावट आई, जबकि S&P 500 इंडेक्स भी लगभग 0.7% नीचे आया। यह गिरावट निवेशकों की बढ़ती चिंता को दिखाती है।
बॉन्ड यील्ड का बढ़ता दबाव
इस बिकवाली की मुख्य वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury Yields) में आई तेज बढ़ोतरी है। 30-साल की यील्ड 2007 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई, जबकि 10-साल की यील्ड 2025 की शुरुआत के बाद से उच्चतम स्तर पर है। बढ़ती ब्याज दरें कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा कर देती हैं और उनके भविष्य के मुनाफे के वर्तमान मूल्य को कम कर देती हैं। इसका सीधा असर टेक्नोलॉजी कंपनियों पर पड़ता है, जो भविष्य की कमाई की उम्मीदों पर ज्यादा निर्भर करती हैं।
सेमीकंडक्टर सेक्टर पर मार
खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और चिप बनाने वाली कंपनियों के शेयर बुरी तरह पिटे। सेमीकंडक्टर सेक्टर के प्रमुख बैरोमीटर, फिलाडेल्फिया सेमीकंडक्टर इंडेक्स (Philadelphia Semiconductor Index) में एक ही दिन में करीब 5% की भारी गिरावट आई। Micron Technology, Western Digital, Sandisk, Marvell Technology और Intel जैसी बड़ी टेक कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली देखी गई।
तेल की कीमतों में उछाल और भू-राजनीतिक तनाव
ब्याज दरों की चिंताओं के अलावा, भू-राजनीतिक तनाव ने भी निवेशकों के भरोसे को हिला दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच 60-दिन के सीजफायर (Ceasefire) का नवीनीकरण न होने से तेल की कीमतों में इजाफा हुआ है। ऊर्जा की ऊंची कीमतें महंगाई को बढ़ा सकती हैं, जिससे फेडरल रिजर्व के लिए ब्याज दरों को लेकर फैसले लेना मुश्किल हो जाएगा। जहां टेक सेक्टर दबाव में है, वहीं ऊर्जा सेक्टर में सप्लाई की चिंताओं के चलते कई कंपनियों के शेयरों में तेजी आई है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
भारतीय बाजार के निवेशकों को इन वैश्विक डेवलपमेंट पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ती है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित और ज्यादा यील्ड वाले अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में निवेश कर सकते हैं। इससे भारतीय रुपये पर दबाव आ सकता है और घरेलू शेयर बाजार में भी गिरावट देखने को मिल सकती है।
इसके अलावा, अमेरिकी बाजार में टेक शेयरों में आई यह गिरावट अक्सर भारतीय आईटी कंपनियों को भी प्रभावित करती है, क्योंकि उनका रेवेन्यू (Revenue) बड़े पैमाने पर अमेरिका पर निर्भर करता है। साथ ही, भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है, इसलिए वैश्विक तेल की कीमतों में वृद्धि देश के इंपोर्ट बिल को बढ़ा सकती है, जिससे महंगाई और करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
फिलहाल, निवेशक फेडरल रिजर्व की अगली मीटिंग के मिनट्स (Minutes) का इंतजार कर रहे हैं, जिससे ब्याज दरों की भविष्य की दिशा के बारे में और स्पष्टता मिल सकती है। बाजार की इस मौजूदा अस्थिरता को देखते हुए, अमेरिकी यील्ड और वैश्विक भू-राजनीतिक डेवलपमेंट पर नजर रखना बहुत जरूरी है।
