दिल्ली यूनिवर्सिटी से एफिलिएटेड अदिति महाविदयाल और भगिनी निवेदिता कॉलेज अब सीधे 12वीं के मार्क्स के आधार पर एडमिशन देंगे। यह फैसला CUET प्रक्रिया से अलग एक समानांतर एडमिशन रूट खोलता है, जिससे यूनिवर्सिटी की यूनिफॉर्म पॉलिसी पर सवाल उठ रहे हैं।
CUET को छोड़कर 12वीं के मार्क्स पर एडमिशन
दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) से जुड़े अदिति महाविदयाल और भगिनी निवेदिता कॉलेज को अब 12वीं के मेरिट के आधार पर एडमिशन करने की इजाजत मिल गई है। यह फैसला यूनिवर्सिटी के ज्यादातर अंडरग्रेजुएट एडमिशन के लिए जरूरी कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) सिस्टम से एक बड़ा बदलाव है।
सीटों की कमी से जूझ रहे कॉलेज
दिल्ली यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार, विकास गुप्ता ने कन्फर्म किया है कि यह इजाजत खास तौर पर इन दोनों ऑफ-कैंपस संस्थानों में सीटों की भारी कमी को दूर करने के लिए दी गई है। दोनों ही कॉलेजों को हाल के अकादमिक सालों में अपनी क्लासरूम भरने में काफी दिक्कतें आई हैं। उदाहरण के लिए, भगिनी निवेदिता कॉलेज में हाल ही में 985 में से 709 सीटें खाली रह गई थीं। इसी तरह, अदिति महाविदयाल को पिछले साल लगभग 600 सीटें खाली होने की बड़ी कमी का सामना करना पड़ा था। कॉलेज एडमिनिस्ट्रेटर्स का कहना है कि इन कॉलेजों की बाहरी लोकेशन, पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सीमित कनेक्टिविटी और कैंपस सुविधाओं की कमी जैसे कारणों से छात्र सेंट्रलाइज्ड काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान अक्सर दूसरे संस्थानों को चुनते हैं।
एकरूपता और निष्पक्षता पर चिंताएं
इस कदम से यूनिवर्सिटी टीचर एसोसिएशन्स, जैसे इंडियन नेशनल टीचर्स कांग्रेस और एकेडमिक फॉर एक्शन एंड डेवलपमेंट टीचर्स एसोसिएशन, ने नाराजगी जताई है। इन समूहों का तर्क है कि CUET-आधारित कॉमन सीट अलॉटमेंट सिस्टम (CSAS) के साथ-साथ मेरिट-आधारित चैनल लाने से एक असमान मैदान तैयार होता है। आलोचकों का सुझाव है कि अगर सीटों को भरने के लिए अपवाद किए जा रहे हैं, तो ऐसी नीतियां सभी संस्थानों पर पारदर्शी रूप से लागू होनी चाहिए, न कि केवल कुछ खास कॉलेजों तक सीमित। ये शिक्षक अब CUET फ्रेमवर्क की औपचारिक समीक्षा की मांग कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या यह सभी एफिलिएटेड कॉलेजों की जरूरतों को प्रभावी ढंग से पूरा कर रहा है।
निवेशक और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हितधारक इस बात पर नजर रख सकते हैं कि यूनिवर्सिटी इस दोहरी एडमिशन पद्धति को कैसे संभालती है और क्या यह कम एनरोलमेंट वाले अन्य कॉलेजों के लिए एक मिसाल कायम करती है। अगला महत्वपूर्ण विकास यह होगा कि इस नीति का इन दो कॉलेजों में वास्तविक ऑक्यूपेंसी रेट पर क्या असर पड़ता है, खासकर CUET प्रक्रिया के तहत सीट भरने के व्यापक ट्रेंड की तुलना में।
