जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हालिया रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है। 2023-2024 के El Niño के पैटर्न को देखते हुए अनुमान है कि भविष्य में उष्णकटिबंधीय जंगलों का **75%** हिस्सा भीषण गर्मी की चपेट में होगा, जो ग्लोबल सप्लाई चेन और कंपनियों के मार्जिन पर बुरा असर डाल सकता है।
अक्टूबर 2026 की एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, जो भीषण गर्मी और सूखा हमने 2023-2024 के दौरान देखा था, वह 2040 तक हर साल की आम बात हो सकती है। इस शोध में पाया गया है कि दुनिया भर के 75% उष्णकटिबंधीय जंगल लंबे समय तक पर्यावरणीय दबाव झेल रहे हैं। निवेशकों के लिए यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि सप्लाई चेन और इकोनॉमिक रिस्क का गंभीर मामला है।
कमोडिटी मार्केट पर सीधा असर
अमेज़न, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगल पाम ऑयल, रबर, कोको और कॉफी जैसी कमोडिटीज के मुख्य केंद्र हैं। जब ये इकोसिस्टम कमजोर होते हैं, तो इसका असर सीधे कंज्यूमर गुड्स, फूड और बेवरेज सेक्टर पर पड़ता है। जंगलों के 'कार्बन सिंक' से 'कार्बन एमिटर' बनने की प्रक्रिया कंपनियों के लिए दोहरी मुसीबत पैदा कर रही है—एक तरफ कच्चा माल मिलना मुश्किल हो रहा है, तो दूसरी तरफ कार्बन फुटप्रिंट मैनेज करने का रेगुलेटरी दबाव बढ़ रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी (ESG रिस्क)
इन्वेस्टर अब इसे 'फिजिकल रिस्क' के तौर पर देख रहे हैं। जो भारतीय और मल्टीनेशनल कंपनियां अपनी सप्लाई चेन के लिए इन क्षेत्रों पर निर्भर हैं, उन्हें कमोडिटी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है। इसके अलावा, इंश्योरेंस और री-इंश्योरेंस सेक्टर पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि आग और इकोसिस्टम के नुकसान से क्लेम की संख्या बढ़ेगी, जिससे रिस्क प्रीमियम और ऊंचे हो जाएंगे।
आगे क्या करें निवेशक?
अब निवेशकों की नजरें कंपनियों के 'डिस्क्लोजर' पर हैं। कंपनियां इस फिजिकल रिस्क को अपने ऑपरेशनल प्लान में कैसे शामिल कर रही हैं, यह देखना जरूरी होगा। जो कंपनियां सस्टेनेबल सोर्सिंग और क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर में निवेश कर रही हैं, वही लंबी अवधि में बेहतर स्थिति में होंगी।
