सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के आदेश के बावजूद भारत में 'गोल्डन ऑवर' ट्रॉमा रिस्पॉन्स सिस्टम अभी भी चुनौतियों से जूझ रहा है। PM-RAHAT योजना के तहत कैशलेस इलाज का वादा कागजों पर तो है, लेकिन प्रशासनिक देरी और पुलिस वेरिफिकेशन जैसी बाधाएं मरीजों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 26 मई 2026 को ट्रॉमा केयर को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था। इस निर्देश का मुख्य उद्देश्य 112 हेल्पलाइन, जीपीएस एम्बुलेंस नेटवर्क और ट्रॉमा रजिस्ट्री जैसी सुविधाओं को स्टैंडर्डाइज करना था। हालांकि, छह महीने बीत जाने के बाद भी यह सिस्टम पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ पाया है। दिक्कत यह है कि इमरजेंसी रिस्पॉन्स से जुड़ी एजेंसियां—जैसे पुलिस और अस्पताल—एक तालमेल के बजाय अलग-अलग दिशाओं में काम कर रही हैं।
PM-RAHAT के सामने चुनौतियां
इस मिशन का सबसे अहम हिस्सा PM-RAHAT स्कीम है, जिसका लक्ष्य सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को पहले सात दिनों के लिए ₹1.5 लाख तक का कैशलेस इलाज मुहैया कराना है। लेकिन, 2026 के मध्य तक के आंकड़े बताते हैं कि पुलिस वेरिफिकेशन की सख्त शर्तों और प्रशासनिक पेचीदगियों के कारण हजारों जरूरतमंदों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
हेल्थकेयर सेक्टर पर असर
इस अव्यवस्था का असर निजी अस्पतालों पर भी पड़ रहा है, जो सरकारी आदेश के तहत इलाज तो शुरू कर देते हैं, लेकिन रिइम्बर्समेंट (Reimbursement) मिलने में देरी के चलते उन्हें वित्तीय अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। अगर पेमेंट साइकिल धीमी रही, तो ट्रॉमा नेटवर्क को बड़े स्तर पर खड़ा करना मुश्किल होगा।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल केंद्रीय आदेश काफी नहीं हैं, बल्कि जिला स्तर पर ठोस प्लानिंग की जरूरत है। 'राह-वीर' (Rah-Veer) पहल भी अभी तक उम्मीद के मुताबिक लोगों को आकर्षित नहीं कर पाई है। अब फोकस नेशनल ट्रॉमा रजिस्ट्री विकसित करने पर है, ताकि हर जगह एक समान रिस्पॉन्स टाइम सुनिश्चित किया जा सके।
