बड़ी भारतीय कंपनियां अब ट्रेडिशनल कैंपस प्लेसमेंट की जगह इंटर्नशिप-आधारित भर्ती पर जोर दे रही हैं। स्कॉलरशिप और प्रोजेक्ट्स के जरिए कंपनियों का लक्ष्य टैलेंट को परखना और ट्रेनिंग खर्च कम करना है।
भारतीय कॉरपोरेट्स और फाइनेंशियल संस्थानों में भर्ती का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब कंपनियां फाइनल प्लेसमेंट का इंतजार करने के बजाय 2 महीने की समर इंटर्नशिप को 'एक्सटेंडेड इंटरव्यू' की तरह इस्तेमाल कर रही हैं, ताकि सीधे Pre-Placement Offers (PPO) दिए जा सकें। इसका मकसद उन हाई-पोटेंशियल कैंडिडेट्स को चुनना है, जो सीधे बिजनेस-क्रिटिकल रोल्स संभाल सकें।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
इन्वेस्टर के नजरिए से देखें तो ह्यूमन कैपिटल पर होने वाला खर्च किसी भी कंपनी के लिए बड़ा एक्सपेंस है। नई हायरिंग को ऑनबोर्ड करने और ट्रेनिंग देने में जो समय और पैसा खर्च होता है, उसे कम करके कंपनियां अपने ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margins) को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही हैं। यह एक तरह का स्मार्ट इन्वेस्टमेंट है जिससे भविष्य के लिए लीडर्स की पाइपलाइन तैयार की जा रही है।
नई पहल और स्ट्रेटजी
- Adani Group: कंपनी 'Adani Academic Leadership Programme' के तहत टैलेंट को स्कॉलरशिप दे रही है ताकि ब्रांड वैल्यू बढ़े और अच्छे कैंडिडेट्स से शुरुआत में ही जुड़ाव हो सके।
- Avendus Capital: इन्वेस्टमेंट बैंकिंग क्षेत्र की यह फर्म अब लाइव डील सिमुलेशन का इस्तेमाल कर रही है, ताकि कैंडिडेट्स की व्यावहारिक समस्या सुलझाने की क्षमता को परखा जा सके।
जोखिम और चुनौतियां
हालांकि, यह रणनीति जोखिम से मुक्त नहीं है। यदि इंटर्न का पूर्णकालिक (full-time) कर्मचारियों में कन्वर्जन रेट कम रहता है, तो स्कॉलरशिप और हाउसिंग सब्सिडी पर हुआ शुरुआती खर्च बेकार जा सकता है। साथ ही, चुनिंदा इंस्टीट्यूट्स पर अधिक निर्भरता टैलेंट डायवर्सिटी को भी प्रभावित कर सकती है। अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि ये कंपनियां इन इंटर्न्स को कितनी कुशलता से अपनी कोर टीम का हिस्सा बनाती हैं और यह उनके लॉन्ग-टर्म प्रोडक्टिविटी पर क्या असर डालता है।
