भारत के विदेश में पढ़ाई करने के इच्छुक छात्रों में से आधे अब Tier 2 और Tier 3 शहरों से हैं। ये छात्र अब अमेरिका जैसे महंगे देशों के बजाय जर्मनी जैसे बजट-फ्रेंडली यूरोपीय विकल्पों को चुन रहे हैं, जिससे EdTech और स्टूडेंट-लेंडिंग कंपनियों का बिजनेस मॉडल पूरी तरह बदल रहा है।
भारत के ओवरसीज एजुकेशन मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। EdTech कंपनी upGrad के 53,800 छात्रों के डेटा से पता चलता है कि अब विदेश में पढ़ाई केवल बड़े शहरों के रईस परिवारों तक सीमित नहीं रही है। मिडिल क्लास परिवारों की बढ़ती आकांक्षाओं के कारण छोटे शहरों से भी बड़ी संख्या में छात्र विदेश जाने का सपना देख रहे हैं।
किफ़ायत है बड़ी वजह
छोटे शहरों के छात्र अब ऐसे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं जहाँ कुल पढ़ाई का खर्च ₹30 लाख से कम हो। यही कारण है कि अमेरिका जैसे महंगे बाजारों की जगह अब यूरोपीय देशों की मांग बढ़ गई है। इन देशों में ट्यूशन फीस कम है और पढ़ाई के बाद काम के अवसर भी बेहतर मिलते हैं।
जर्मनी बना छात्रों की पहली पसंद
जनवरी 2025 से जून 2026 तक के डेटा के अनुसार, जर्मनी अकेले 51% छात्रों की पसंद बनकर उभरा है। जर्मनी के अलावा फ्रांस, स्पेन, फिनलैंड और आयरलैंड भी लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। इन देशों की सरकारी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई का खर्च बहुत कम या न के बराबर होता है, जो छोटे शहरों के छात्रों के लिए निवेश पर रिटर्न (ROI) के लिहाज से काफी आकर्षक है।
बिजनेस मॉडल पर दबाव
इस बदलाव ने EdTech प्लेटफॉर्म्स और लोन देने वाले संस्थानों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। पहले ये कंपनियां प्रीमियम ग्राहकों पर ध्यान देती थीं, लेकिन अब उन्हें कम मार्जिन पर अधिक वॉल्यूम के साथ काम करना होगा। बैंकों और NBFCs के लिए एजुकेशन लोन पोर्टफोलियो में बढ़त इस सेक्टर की सेहत का बड़ा पैमाना साबित होगी। निवेशकों को अब यूरोपीय देशों की वीजा नीतियों और कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
