वित्त मंत्रालय ने Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 पेश किया है। इस बिल में भारत में मैनेज होने वाले ऑफशोर फंड्स के लिए नियमों को सरल बनाया गया है, और इलेक्ट्रॉनिक्स व डायमंड ट्रेड के लिए टैक्स छूट को 2041 तक बढ़ाया गया है।
भारत सरकार का बड़ा कदम: नया टैक्स बिल पेश
भारतीय सरकार ने 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026' पेश किया है। इसका मकसद जून के अध्यादेश की जगह एक आसान टैक्स सिस्टम लाना है। निवेशकों के लिए, यह बिल भारत को ग्लोबल इन्वेस्टमेंट फंड्स और हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक आकर्षक केंद्र बनाने की एक बड़ी रणनीति है।
ऑफशोर फंड्स के लिए नियम आसान
इस बिल की सबसे बड़ी खासियत है भारत से मैनेज होने वाले ऑफशोर इन्वेस्टमेंट फंड्स के लिए टैक्स नियमों का सरलीकरण। अभी, ऐसे फंड्स को देश में टैक्सेबल बिजनेस कनेक्शन से बचने के लिए सख्त शर्तों को पूरा करना पड़ता है। नए प्रस्ताव में, निवेशक सीमा और फंड के आकार पर लगी पाबंदियों जैसी कई बाधाएं दूर की गई हैं। सरकार का इरादा है कि इससे ग्लोबल एसेट मैनेजर्स के लिए भारत से ऑपरेट करना आसान हो जाएगा, जिससे घरेलू बाज़ारों में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है।
मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड के लिए टैक्स इंसेंटिव
यह बिल अहम सेक्टरों में सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए बड़े टैक्स इंसेंटिव का प्रस्ताव करता है। इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में शामिल विदेशी कंपनियां, जो भारतीय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स के लिए बॉन्डेड एरिया के ज़रिए कंपोनेंट्स स्टोर और सेल करती हैं, उन्हें 31 मार्च, 2041 तक टैक्स छूट मिलेगी। इसका उद्देश्य घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। इसी तरह, विशेष ज़ोन में रफ डायमंड ट्रेड में शामिल विदेशी संस्थाओं को भी 2041 तक टैक्स छूट मिलेगी। डेटा सेंटर्स को भी सरल नियमों से फायदा होगा, क्योंकि बिल में डेटा सेंटर ऑपरेटर्स और विदेशी कंपनियों के लिए अलग नोटिफिकेशन की ज़रूरत खत्म करने का प्रस्ताव है, साथ ही लीज़-आधारित व्यवस्थाओं को भी शामिल किया गया है।
बिजनेस ट्रस्ट्स पर असर
बिल में बिजनेस ट्रस्ट्स, जैसे रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REITs) और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) के टैक्स ट्रीटमेंट पर भी बात की गई है। एक अहम प्रस्ताव यह है कि यूनिट होल्डर्स द्वारा कमाए गए डिविडेंड इनकम पर टैक्स छूट बहाल की जाएगी, भले ही अंडरलाइंग स्पेशल पर्पज़ व्हीकल (SPV) एक कंसेशनल टैक्स रिजीम का विकल्प चुनता है या नहीं। हालांकि, इन ट्रस्टों के निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि कंसेशनल टैक्स रिजीम चुनने वाले SPVs के लिए सरचार्ज 10% से बढ़कर 25% हो जाएगा। सरचार्ज में यह बढ़ोतरी इन स्ट्रक्चर्स के भीतर SPVs की ओवरऑल टैक्स एफिशिएंसी को प्रभावित कर सकती है।
आगे क्या?
ये प्रस्ताव फिलहाल एक बिल का हिस्सा हैं और इन्हें भारतीय संसद की मंज़ूरी का इंतज़ार है। निवेशक और एनालिस्ट्स को कानून के अंतिम संस्करण पर नज़र रखनी होगी कि क्या बहस के दौरान कोई और बदलाव किए जाते हैं। इन नियमों का खास इम्प्लीमेंटेशन, खासकर 'स्पेसिफाइड इलेक्ट्रॉनिक गुड्स' की परिभाषा और नई छूटों के ऑपरेशनल डिटेल्स, मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण निगरानी बिंदु होंगे। जैसे-जैसे बिल विधायी प्रक्रिया से आगे बढ़ेगा, बाज़ार सहभागियों द्वारा यह आकलन किया जाएगा कि ये बदलाव आने वाली तिमाहियों में कॉर्पोरेट टैक्स प्लानिंग और विदेशी निवेश की रणनीतियों को कैसे प्रभावित करते हैं।
