Tata Trusts के ट्रस्टीज वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने चेयरमैन नोएल टाटा के उस प्लान का विरोध किया है, जिसमें Tata Sons को रिस्ट्रक्चर करने की बात थी। यह कदम RBI के नियमों से बचने के लिए उठाया गया था, जिससे अब ग्रुप के शेयरों में अनिश्चितता का माहौल है।
टाटा ग्रुप के भीतर कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर मामला गंभीर होता जा रहा है। दरअसल, नोएल टाटा की ओर से प्रस्तावित मर्जर प्लान को लेकर वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने सीधा मोर्चा खोल दिया है। इस प्लान के तहत Tata Electronics Systems Solutions और Tata Consulting Engineers को सीधे Tata Sons में मर्ज करने की योजना थी।
RBI के नियमों से बचने की कोशिश
पूरा विवाद Tata Sons के रेगुलेटरी स्टेटस को लेकर है। RBI के नियमों के मुताबिक, Tata Sons एक 'अपर-लेयर' NBFC है, जिसके लिए पब्लिक लिस्टिंग अनिवार्य है। इस मर्जर का मकसद कंपनी को एक होल्डिंग कंपनी से बदलकर 'हाइब्रिड ऑपरेटिंग कंपनी' बनाना था, ताकि NBFC के दायरे से बाहर निकला जा सके और लिस्टिंग की मजबूरी न रहे। हालांकि, सितंबर 2026 में RBI पहले ही इस तरह की छूट देने से इनकार कर चुका है।
गवर्नेंस पर उठे सवाल
ट्रस्टीज का कहना है कि यह इतना बड़ा फैसला बिना किसी आधिकारिक मीटिंग या संस्थागत मंजूरी के लिया गया। Sir Dorabji Tata Trust में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई, जिससे बोर्ड के अंदर की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। यह विवाद अब महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर (Maharashtra Charity Commissioner) के पास पहुंच चुका है, जहां कानूनी तौर पर कैविएट दाखिल की गई है ताकि एकतरफा आदेश न हो सकें।
निवेशकों के लिए अनिश्चितता
इस आंतरिक कलह का सीधा असर बाजार में दिख सकता है। Tata Investment Corporation और Tata Chemicals जैसी कंपनियों के जरिए टाटा ग्रुप का एक जटिल क्रॉस-होल्डिंग स्ट्रक्चर है। जब भी होल्डिंग कंपनी Tata Sons के रेगुलेटरी स्टेटस पर अस्पष्टता होती है, तो ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव (volatility) बढ़ना स्वाभाविक है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या नेतृत्व जल्द ही इस पर कोई आम सहमति बना पाएगा या यह विवाद और लंबा खिंचेगा।
