सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) के ट्रस्टी विजय सिंह का कार्यकाल 14 अगस्त को खत्म होने वाला है। लेकिन, महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर (MCC) ने ट्रस्ट की बोर्ड मीटिंग पर रोक लगा दी है, जिससे उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़ा हो गया है।
Detailed Coverage
ट्रस्टी की नियुक्ति पर अनिश्चितता
सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) इस समय एक बड़ी कानूनी मुश्किल में फंसा हुआ है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर (MCC) ने 15 मई को एक आदेश जारी कर दिया है, जिसके तहत ट्रस्ट की बोर्ड मीटिंग्स पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक कि ट्रस्टियों की संरचना को लेकर चल रही जांच पूरी नहीं हो जाती और जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट सबमिट नहीं कर देते।
विजय सिंह का बाहर निकलना?
ट्रस्टी विजय सिंह का कार्यकाल 14 अगस्त, 2026 को समाप्त हो रहा है। सिंह, जो 78 वर्ष के हैं, ने स्पष्ट कर दिया है कि वे दोबारा नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे। उन्होंने अपनी उम्र और अन्य ट्रस्टों से भी धीरे-धीरे हटने की योजना को इसका कारण बताया है। सिंह, जो एक पूर्व नौकरशाह हैं, को दिवंगत रतन टाटा ने 2018 में ट्रस्ट के बोर्ड में शामिल किया था।
जांच का कारण
इस नियामक जांच की शुरुआत ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन और वकील कात्यायनी अग्रवाल की शिकायतों के बाद हुई। उन्होंने परपेचुअल ट्रस्टियों की संरचना और नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए थे।
टाटा संस पर असर
SRTT, सर डोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) के साथ मिलकर, टाटा संस में 51.54% की बहुमत हिस्सेदारी रखता है, जो टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। SRTT बोर्ड की मीटिंग्स न हो पाने की स्थिति में, होल्डिंग कंपनी स्तर के महत्वपूर्ण निर्णयों पर इसका असर पड़ सकता है। इनमें 18 अगस्त, 2026 को होने वाली टाटा संस की वार्षिक आम बैठक (AGM) भी शामिल है।
नेतृत्व परिवर्तन की चुनौतियां
विजय सिंह के कार्यकाल के अलावा, बोर्ड अन्य नेतृत्व परिवर्तनों से भी गुजर रहा है। ट्रस्टी डेरियस खंबाटा और वेणु श्रीनिवासन का कार्यकाल भी क्रमशः नवंबर और दिसंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। MCC के आदेश के कारण, किसी भी नए ट्रस्टी की नियुक्ति या बोर्ड की खाली सीटों को भरने की प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई है।
हालांकि, अगर यह रोक हट भी जाती है, तो भी ट्रस्ट के आंतरिक शासन में जटिलताएं बनी रहेंगी। सूत्रों के अनुसार, बोर्ड में मतभेद हैं और किसी भी नई नियुक्ति के लिए आम सहमति की आवश्यकता होगी, जो मौजूदा माहौल में एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
निवेशक और टाटा ग्रुप से जुड़े हितधारक चैरिटी कमिश्नर की जांच की प्रगति पर नजर रखेंगे, क्योंकि इसी जांच के नतीजे यह तय करेंगे कि बोर्ड कब सामान्य रूप से काम कर सकेगा और नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकेगा।
