Tata Sons में चेयरमैन N. Chandrasekaran की री-अपॉइंटमेंट को लेकर विवाद गहरा गया है। बोर्ड मीटिंग में Noel Tata और Venu Srinivasan के बीच हुए डेडलॉक को एक 'कास्टिंग वोट' के जरिए सुलझाया गया, जिस पर अब कानूनी विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं।
विवाद की जड़ और 'कास्टिंग वोट'
Tata Sons के चेयरमैन N. Chandrasekaran के दूसरे 5 साल के कार्यकाल के लिए री-अपॉइंटमेंट की प्रक्रिया विवादों में आ गई है। कंपनी की बोर्ड मीटिंग में Noel Tata और Venu Srinivasan के बीच एक गतिरोध पैदा हो गया था। कंपनी के नियमों के मुताबिक, इस तरह के प्रस्तावों के लिए ट्रस्टी-नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स के बीच सहमति जरूरी होती है।
कानूनी बहस और बचाव
इस गतिरोध को तोड़ने के लिए Nomination and Remuneration Committee के चेयरमैन Harish Manwani ने अपने 'कास्टिंग वोट' का इस्तेमाल किया। पूर्व चीफ जस्टिस D.Y. Chandrachud ने इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहा है कि कास्टिंग वोट का इस्तेमाल अनिवार्य सहमति की शर्तों को दरकिनार नहीं कर सकता।
दूसरी ओर, कंपनी की तरफ से वरिष्ठ वकील Harish Salve ने इस कदम का बचाव किया है। उनका तर्क है कि यह निर्णय कंपनी में कामकाज को ठप होने से बचाने के लिए लिया गया था और कंपनी किसी भी कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
Tata Sons ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी है, जो Tata Consultancy Services, Tata Motors और Tata Steel जैसी दिग्गज कंपनियों को कंट्रोल करती है। निवेशकों के लिए चिंता का विषय यह है कि क्या यह विवाद केवल कानूनी बहस तक सीमित रहेगा या यह ग्रुप की भविष्य की निर्णय लेने की प्रक्रिया (Decision-making process) को प्रभावित करेगा। फिलहाल, मार्केट की नजर इस बात पर है कि क्या कंपनी की ओर से कोई और स्पष्टीकरण या रेगुलेटरी फाइलिंग आती है।
