Tata Sons के बोर्ड ने N. Chandrasekaran को **5** साल का नया कार्यकाल देने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन मुख्य हिस्सेदार Tata Trusts ने इसमें प्रक्रियागत खामियों का हवाला देते हुए आपत्ति जताई है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब कंपनी पर RBI की ओर से पब्लिक लिस्टिंग का दबाव बना हुआ है।
टाटा ग्रुप के सबसे ऊपरी पायदान पर गवर्नेंस को लेकर बड़ा मतभेद सामने आया है। Tata Sons के बोर्ड ने N. Chandrasekaran को फरवरी 2027 में समाप्त होने वाले मौजूदा कार्यकाल के बाद और 5 साल के लिए चेयरमैन बनाए रखने का फैसला किया था। इस फैसले को कंपनी में 66% हिस्सेदारी रखने वाली संस्था Tata Trusts ने चुनौती दी है। ट्रस्ट का तर्क है कि इस प्रस्ताव को पारित करने में कंपनी के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
RBI की लिस्टिंग की चुनौती
यह आंतरिक खींचतान ऐसे समय में हुई है जब Tata Sons के लिए मुश्किलें कम नहीं हैं। RBI ने कंपनी को 'अपर लेयर NBFC' के रूप में वर्गीकृत किया है और उसे अनिवार्य रूप से पब्लिक लिस्टिंग की प्रक्रिया पूरी करनी है। हालांकि लिस्टिंग की डेडलाइन सितंबर 2025 थी, लेकिन कंपनी अब तक इसे पूरा नहीं कर पाई है। बोर्ड और ट्रस्ट के बीच जारी यह विवाद अब पब्लिक ऑफरिंग से जुड़े बड़े फैसलों की राह में बाधा बन सकता है।
ग्रुप पर क्या होगा असर?
Tata Sons, TCS, Tata Motors, Tata Steel और Tata Power जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए मुख्य निवेश कंपनी (Holding Company) है। हालांकि ये कंपनियां अपने स्वतंत्र बोर्ड के साथ काम करती हैं, लेकिन लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी और कैपिटल एलोकेशन के लिए वे पूरी तरह Tata Sons पर निर्भर हैं।
फिलहाल, मार्केट की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या बोर्ड और ट्रस्ट के बीच कोई सहमति बन पाएगी। Noel Tata की अध्यक्षता में चल रहे Tata Trusts और कंपनी के बोर्ड के बीच का यह तालमेल निवेशकों के भरोसे के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब ग्रुप सेमीकंडक्टर और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे बड़े सेक्टर में भारी निवेश की तैयारी कर रहा है।
