Tata Sons का नया चेयरमैन कौन? सामने ₹28,823 करोड़ का भारी नुकसान, एयर इंडिया, टाटा डिजिटल पर बड़ी चुनौती

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AuthorMehul Desai|Published at:
Tata Sons का नया चेयरमैन कौन? सामने ₹28,823 करोड़ का भारी नुकसान, एयर इंडिया, टाटा डिजिटल पर बड़ी चुनौती

टाटा संस के चेयरमैन N. Chandrasekaran फरवरी 2027 में पद छोड़ देंगे। उनकी जगह लेने वाले नए लीडर को तीन बड़ी कंपनियों - एयर इंडिया, टाटा डिजिटल और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स - का जिम्मा मिलेगा, जिन्होंने पिछले फाइनेंशियल ईयर में मिलकर **₹28,800 करोड़** से ज़्यादा का घाटा दिखाया है। यह एक बड़ी फाइनेंशियल चुनौती होगी।

टाटा संस के चेयरमैन N. Chandrasekaran ने ऐलान किया है कि वे अपने मौजूदा टर्म के बाद पद पर बने नहीं रहेंगे। वह 20 फरवरी 2027 को चेयरमैन का पद छोड़ देंगे। यह फैसला टाटा ट्रस्ट्स के साथ रणनीति, बढ़ते कर्ज और होल्डिंग कंपनी की लिस्टिंग को लेकर चल रहे मतभेदों के बाद आया है। नेतृत्व परिवर्तन की ओर बढ़ते हुए, आने वाले चेयरमैन को ग्रुप के उन बड़े और खर्चीले प्रोजेक्ट्स का जिम्मा मिलेगा जो फिलहाल ग्रुप की फाइनेंसियल सेहत पर भारी पड़ रहे हैं।

घाटे वाली यूनिट्स की बड़ी चुनौती

टाटा ग्रुप जहाँ सेमीकंडक्टर और एविएशन जैसे सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं तीन कंपनियां ग्रुप के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन गई हैं। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में एयर इंडिया, टाटा डिजिटल और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने मिलकर कुल ₹28,823 करोड़ का घाटा दर्ज किया। नए लीडरशिप के सामने इन बिज़नेस में ज़रूरी कैपिटल इन्वेस्टमेंट को ग्रुप की प्रॉफिटेबिलिटी सुधारने की ज़रूरत के साथ बैलेंस करना एक बड़ी चुनौती होगी।

एयर इंडिया की फाइनेंशियलि दिक्कतें

एयर इंडिया फिलहाल ग्रुप के बैलेंस शीट पर सबसे बड़ा बोझ है। इस एयरलाइन ने FY26 में ₹22,238 करोड़ का घाटा दिखाया है, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुना से भी ज़्यादा है। हालांकि टाटा ग्रुप एयरलाइन को एक ग्लोबल एविएशन हब बनाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन बेड़े के आधुनिकीकरण और ऑपरेशनल दिक्कतों को दूर करने में काफी पैसा और समय लगेगा। निवेशकों की नज़रें ऑपरेशनल स्टेबिलिटी के संकेतों पर होंगी, क्योंकि इस टर्नअराउंड में अभी कई साल लग सकते हैं।

टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल की मुश्किलें

टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने रेवेन्यू के मामले में अच्छी तरक्की की है, जो सरकारी मैन्युफैक्चरिंग पहलों और चिप-मेकिंग ऑर्डर्स की वजह से ₹1.3 लाख करोड़ के पार चला गया है। हालांकि, कंपनी अभी भी भारी निवेश के दौर से गुजर रही है और प्रॉफिटेबिलिटी पाना एक लॉन्ग-टर्म लक्ष्य है। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कड़े मुकाबले को देखते हुए कंपनी को प्रोडक्शन बढ़ाने के साथ-साथ कॉस्ट को भी मैनेज करना होगा।

इसी बीच, टाटा डिजिटल को भी लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इस यूनिट ने ₹4,974 करोड़ का घाटा दर्ज किया। इसका फ्लैगशिप 'Neu' सुपर ऐप एक भीड़ भरे मार्केट में अपनी अलग पहचान बनाने में संघर्ष कर रहा है। इसके अलावा, BigBasket के अधिग्रहण से भी अपेक्षित मार्केट डोमिनेंस हासिल नहीं हुआ है। Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart जैसे दिग्गजों से कड़े मुकाबले के चलते, BigBasket का मार्केट शेयर अभी भी सिंगल डिजिट में बना हुआ है, जिससे ग्रुप के लिए डिजिटल कंज्यूमर स्पेस में आगे बढ़ना एक कठिन लड़ाई साबित हो रहा है।

गवर्नेंस और लिस्टिंग का दबाव

ऑपरेशनल घाटे के अलावा, नए चेयरमैन को संभावित रेगुलेटरी दबावों से भी निपटना होगा। मौजूदा वित्तीय नियमों के तहत, टाटा संस को 'अपर-लेयर' NBFC के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिससे होल्डिंग कंपनी को पब्लिक में लिस्ट कराने का दबाव बन सकता है। इसके साथ ही, प्रोजेक्ट ओवरसाइट और कैपिटल एलोकेशन को लेकर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स (जिनके चेयरमैन Noel Tata हैं) के बीच चल रहे तनाव, गवर्नेंस के जोखिम को बढ़ाते हैं। बाज़ार इस बात पर नज़र रखेगा कि नई लीडरशिप ग्रुप की अंडरपरफॉर्मिंग एसेट्स को संभालने के साथ-साथ इन इंटरनल डायनामिक्स को कैसे मैनेज करती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.