Trinamool Congress के बागी सांसदों पर अयोग्यता (disqualification) का खतरा मंडरा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये सांसद BJP में शामिल होने की योजना बना रहे हैं, जिससे राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई है और लोकसभा स्पीकर इस पूरे मामले की जांच कर रहे हैं।
विलय का दांव और कानूनी पचड़ा
Trinamool Congress के भीतर चल रही आंतरिक कलह तब और गहरा गई जब कूचबिहार के सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया कि पार्टी के बागी गुट के ज्यादातर नेता दुर्गा पूजा से पहले BJP का दामन थाम सकते हैं। यह दावा ऐसे समय में आया है जब ये नेता Nationalist Citizens Party of India के साथ अपने विलय के फैसले को लेकर कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
एंटी-डिफेक्शन कानून से बचने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि BJP में शामिल होने की यह कवायद असल में एंटी-डिफेक्शन कानून (Anti-defection law) से बचने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। नियमों के मुताबिक, किसी दल का विलय तब वैध माना जाता है जब कम से कम 2/3 सांसद उसका समर्थन करें। इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए बागी नेता अपनी स्थिति सुरक्षित करने की जुगत में हैं, ताकि लोकसभा स्पीकर के पास लंबित अयोग्यता की याचिकाओं से बचा जा सके। हालांकि, इस गुट में भी एकता की कमी साफ दिख रही है। सतब्दी रॉय और अबू ताहिर खान जैसे वरिष्ठ सांसदों ने इन दावों से खुद को अलग कर लिया है।
व्यापार और प्रशासनिक अनिश्चितता
राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर राज्य के बिजनेस एनवायरनमेंट पर भी पड़ता है। नीतिगत फैसलों में देरी और प्रशासनिक अनिश्चितता के चलते निवेशक अब स्थिति पर पैनी नजर रख रहे हैं। जब नेतृत्व की वैधता ही सवालों के घेरे में हो, तो स्थानीय स्तर पर गवर्नेंस और एडमिनिस्ट्रेशन की भविष्यवाणी करना मुश्किल हो जाता है।
आगे क्या होगा?
पूरा मामला फिलहाल लोकसभा सचिवालय और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है। बागी सांसदों को अयोग्यता नोटिस जारी किए गए हैं और 22 सितंबर की डेडलाइन तय की गई है। इस तारीख तक मिलने वाले जवाब यह तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल का राजनीतिक समीकरण आने वाले दिनों में क्या रुख लेगा।
