सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 9 के लिए CBSE की अनिवार्य 'थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी' के क्रियान्वयन पर केंद्र सरकार से एक सप्ताह में स्पष्ट कार्ययोजना मांगी है। अदालत का मुख्य फोकस छात्रों पर शैक्षणिक दबाव को कम करने और स्कूली संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर है।
सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की अनिवार्य 'थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी' मामले की सुनवाई को एक सप्ताह के लिए टाल दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सरकार को इस बड़े करिकुलम बदलाव को लागू करने के तौर-तरीकों (Modalities) पर स्पष्ट रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दिया है।
NEP 2020 का असर
यह नीति National Education Policy (NEP) 2020 के अनुरूप है, जिसके तहत कक्षा 9 के छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। हालांकि कोर्ट ने इस फैसले पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन इसके क्रियान्वयन के व्यावहारिक और छात्रों के कल्याण संबंधी पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
शिक्षकों की कमी और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती
अदालत ने विशेष रूप से स्कूलों में पर्याप्त मानव संसाधन और योग्य शिक्षकों की कमी की ओर इशारा किया है। बेंच ने यह भी सवाल किया कि क्या इतनी जल्दी इस बदलाव को लागू करना छात्रों पर अनुचित शैक्षणिक दबाव नहीं डालेगा।
शिक्षा क्षेत्र पर प्रभाव
इस पॉलिसी के कारण एजुकेशन इंडस्ट्री में मांग का स्वरूप बदल रहा है। पब्लिशर्स और करिकुलम प्रोवाइडर्स को अब अंग्रेजी आधारित सिलेबस के बजाय भारतीय भाषाओं के अनुकूल सामग्री तैयार करनी होगी। जब तक नई किताबें तैयार नहीं हो जातीं, बोर्ड ने क्लास 6 के मौजूदा करिकुलम को एक ब्रिज के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी है। स्कूलों को OASIS पोर्टल पर अपनी भाषा संबंधी जानकारी अपडेट करना अनिवार्य है।
आने वाले समय में निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स की नजरें इस बात पर टिकी होंगी कि सरकार शिक्षकों की भर्ती और नई किताबों की उपलब्धता को कैसे मैनेज करती है, क्योंकि इसका सीधा असर स्कूलों के बजट और करिकुलम प्रोक्योरमेंट पर पड़ेगा।
