देश की राजधानी में प्रदूषण के बिगड़ते स्तर के बीच Supreme Court ने 'green crackers' की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट की इस सख्ती से फायरक्रैकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए रेगुलेटरी जोखिम बढ़ गए हैं और आने वाले समय में सख्त पाबंदियां देखने को मिल सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों के दौरान होने वाले प्रदूषण को लेकर 'green crackers' को एक समाधान मानने से इनकार कर दिया है। नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) में हवा की गुणवत्ता का हाल यह है कि PM2.5 का स्तर 488 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच गया है, जो पिछले 4 सालों में सबसे अधिक है। अदालत की ओर से मौजूदा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पर सवाल उठाए जाना संकेत देता है कि अब इस सेक्टर पर लगाम और कसी जा सकती है।
क्यों बढ़ रहा है रेगुलेटरी रिस्क?
सालों से इंडस्ट्री ने 'green crackers' को पारंपरिक पटाखों का एक बेहतर विकल्प बताया है, लेकिन कोर्ट ने इनके वेरिफिकेशन सिस्टम में बड़ी कमियां पाई हैं। कोर्ट का मानना है कि असल में कम प्रदूषण करने वाले पटाखों और आम पटाखों के बीच फर्क करना मुश्किल है। यदि प्रशासन इसे लेकर सख्त सर्टिफिकेशन या पूर्ण प्रतिबंध की दिशा में कदम उठाता है, तो मैन्युफैक्चरर्स के लिए फेस्टिव सीजन के दौरान सप्लाई चेन में भारी व्यवधान पैदा हो सकता है।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
यह पूरा सेक्टर फिलहाल असंगठित (unorganized) है और चुनिंदा मैन्युफैक्चरिंग हब पर निर्भर है। कोर्ट की ओर से जवाबदेही तय करने की मांग के बाद, अब कंपनियों को अपने एमिशन डेटा को लेकर ज्यादा पारदर्शिता दिखानी होगी। इससे अनुपालन लागत (compliance costs) बढ़ने की आशंका है, क्योंकि कंपनियों को सख्त प्रदूषण-नियंत्रण तकनीकों को अपनाना पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
जो निवेशक फेस्टिव रिटेल या केमिकल सेक्टर से जुड़ी कंपनियों में दांव लगाए हुए हैं, उन्हें अब पर्यावरण से जुड़े नियमों पर बारीक नजर रखनी होगी। यह केवल एक सीजन का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक लंबी अवधि का ट्रेंड है जिसमें विस्फोटक आधारित सामानों पर शिकंजा कसना तय माना जा रहा है। आने वाले समय में राज्य सरकारों की सख्ती और कोर्ट के नए आदेश इस पूरे कारोबार की दिशा तय करेंगे।
