CBSE Three-Language Policy: सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की नई पॉलिसी पर उठाए सवाल, शिक्षा क्षेत्र में बढ़ी हलचल

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
CBSE Three-Language Policy: सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की नई पॉलिसी पर उठाए सवाल, शिक्षा क्षेत्र में बढ़ी हलचल

सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 9 के लिए CBSE की नई थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी की समीक्षा शुरू कर दी है। कोर्ट ने इसके लागू होने के तरीके और छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव पर चिंता जताई है। हालांकि फिलहाल इस पर कोई रोक नहीं लगाई गई है, लेकिन स्कूलों के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर कोर्ट पैनी नजर रख रहा है।

ग्राउंड लेवल पर चुनौतियां

नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP 2020) के तहत CBSE ने कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया है, जिसमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। हालांकि अदालत ने 2026-27 के शैक्षणिक सत्र के लिए इस पर रोक लगाने से मना कर दिया है, लेकिन कोर्ट का मानना है कि इतनी तेजी से बदलाव करने से छात्रों पर एकेडमिक दबाव बढ़ सकता है।

CBSE का पक्ष और स्कूलों की तैयारी

CBSE ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर दावा किया है कि उसके लगभग 47.3% स्कूलों में पहले से ही दो या उससे अधिक भारतीय भाषाओं का विकल्प मौजूद है। बोर्ड का यह भी कहना है कि 99.19% स्कूलों के पास नई गाइडलाइंस के मुताबिक पढ़ाने के लिए पर्याप्त टीचर्स हैं। लेकिन कोर्ट की तीखी टिप्पणी बताती है कि बोर्ड के आंकड़ों और स्कूलों की जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर है। स्कूलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती टाइम-टेबल को फिर से सेट करना और योग्य भाषा शिक्षकों की नियुक्ति करना है।

क्या पड़ेगा असर?

शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं और स्कूल ऑपरेटर्स के लिए यह एक बड़ी ऑपरेशनल चुनौती है। नई भाषाएं जोड़ने का सीधा असर उनके एडमिनिस्ट्रेटिव और फाइनेंशियल खर्चों पर पड़ेगा। साथ ही, फॉरेन लैंग्वेजेस के विकल्प अचानक बंद करने से अभिभावकों और विशेषज्ञों के बीच काफी नाराजगी है। इसके अलावा, अंग्रेजी को 'नॉन-नेटिव' भाषा की श्रेणी में रखने पर भी विवाद चल रहा है, जिसे लेकर कोर्ट ने अधिकारियों से इस फ्रेमवर्क पर दोबारा विचार करने को कहा है।

इन्वेस्टर्स के लिए जरूरी संकेत

एजुकेशन सेक्टर में पॉलिसी की स्थिरता काफी मायने रखती है। फिलहाल यह कोई बड़ा फाइनेंशियल संकट नहीं है, लेकिन कोर्ट की इस निगरानी से रेगुलेटरी अनिश्चितता बनी हुई है। इन्वेस्टर्स को आने वाले समय में कोर्ट के निर्देशों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि अगर कोर्ट कोई राहत देता है या इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने का आदेश देता है, तो स्कूलों को अपनी स्टाफिंग और एकेडमिक कैलेंडर में तुरंत बदलाव करना पड़ सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.