सुप्रीम कोर्ट जजों की संख्या में बढ़ोतरी: अध्यादेश पर छिड़ी बहस

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
सुप्रीम कोर्ट जजों की संख्या में बढ़ोतरी: अध्यादेश पर छिड़ी बहस

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश 2026 जारी किया है, जिसका मकसद जजों की संख्या बढ़ाना है। जहाँ इसका उद्देश्य 93,000 से ज़्यादा लंबित मामलों को निपटाना है, वहीं संसदीय बहस के बजाय अध्यादेश का इस्तेमाल विधायी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है।

अध्यादेश की राह और विधायी प्रक्रिया

केंद्र सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश 2026 लागू किया है। इसका मुख्य लक्ष्य सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में स्वीकृत जजों की संख्या को बढ़ाना है। इस बड़े कदम का प्राथमिक उद्देश्य लंबित मामलों के बढ़ते दबाव को कम करना है, जिनकी संख्या 93,000 से ज़्यादा हो चुकी है। जजों की क्षमता बढ़ाना कानूनी व्यवस्था की कार्यकुशलता सुधारने के लिए एक ज़रूरी कदम माना जा रहा है। हालांकि, जिस तरीके से इसे लागू किया गया है, उसने संस्थागत शासन (institutional governance) को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है।

संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत, जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो और तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत हो, तो अध्यादेश जारी किया जा सकता है। लेकिन, ऐसे मामले के लिए अध्यादेश का इस्तेमाल, जिसे सामान्य विधायी प्रक्रिया के ज़रिए निपटाया जा सकता था, कानूनी विद्वानों और नीति विश्लेषकों का ध्यान खींच रहा है। चूंकि सरकार पहले इस विस्तार को एक औपचारिक बिल के रूप में लाने पर विचार कर रही थी, इसलिए अध्यादेश के प्रारूप को अपनाने को आलोचक संसदीय चर्चा को दरकिनार करने के कदम के तौर पर देख रहे हैं।

संसदीय कामकाज पर असर

संसदीय लोकतंत्र में बहस, समितियों की जांच-पड़ताल और विधायी सहमति से कानून बनाने की प्रक्रिया का महत्व है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कानूनों को लागू करने से पहले अच्छी तरह परख लिया जाए। पर्यवेक्षकों का कहना है कि अध्यादेशों के इस्तेमाल की बढ़ती आवृत्ति संसद की भूमिका को केवल कार्यकारी निर्णयों की पुष्टि करने वाली संस्था तक सीमित कर सकती है। इस बदलाव का विधायी माहौल की पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता (predictability) पर असर पड़ सकता है, जिसे अक्सर दीर्घकालिक संस्थागत जोखिम के आकलन में ध्यान में रखा जाता है।

न्यायिक दक्षता का संदर्भ

भारतीय कानूनी प्रणाली के लिए, मामलों का लंबा बैकलॉग एक बड़ी बाधा बना हुआ है। कानूनी विशेषज्ञ अक्सर मुकदमों में तेज़ी लाने और संविदात्मक अधिकारों (contractual rights) की रक्षा के लिए जज-से-जनसंख्या अनुपात (judge-to-population ratio) में सुधार को एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बताते हैं। सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ाने का यह वर्तमान कदम इसी अड़चन की सीधी प्रतिक्रिया है। हालांकि, सरकार के लिए प्रशासनिक कार्रवाई की ज़रूरत और मजबूत संसदीय निगरानी बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती बनी हुई है। अगला महत्वपूर्ण कदम संसद के आगामी सत्र में इस अध्यादेश को एक बिल के रूप में पेश करना होगा, जहाँ यह औपचारिक जांच और मतदान से गुज़रेगा, जिससे इस मामले पर विधायी सहमति की एक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।

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