Supreme Court ने प्राइवेट प्रोफेशनल कॉलेजों पर शिकंजा कसते हुए छात्रों के लिए राहत भरा फैसला सुनाया है। अब एडमिशन के बाद कॉलेज बीच कोर्स में फीस नहीं बढ़ा सकेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में प्राइवेट इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों को बीच सत्र में ट्यूशन फीस बढ़ाने से साफ मना कर दिया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने स्पष्ट किया है कि प्रोफेशनल डिग्री की पूरी फीस संरचना एडमिशन के समय ही तय और घोषित होनी चाहिए। इस आदेश के साथ ही कॉलेजों द्वारा छात्रों पर थोपे जाने वाले मनमाने शुल्क का दौर खत्म हो गया है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
यह कानूनी दखल पश्चिम बंगाल के 'Dr. BC Roy Engineering College' से जुड़े एक मामले के बाद आया है। कॉलेज ने 2023-27 बैच के लिए फीस में 37% का इजाफा किया था और साथ ही नए डेवलपमेंट चार्जेस भी लागू कर दिए थे। कोर्ट ने इस बढ़ोतरी को खारिज कर दिया है। जजों का मानना है कि प्रोफेशनल एजुकेशन के लिए परिवार सालों पहले से प्लानिंग करते हैं और अक्सर एजुकेशन लोन का सहारा लेते हैं। अचानक फीस बढ़ने से छात्रों की पूरी फाइनेंशियल प्लानिंग और डिग्री पूरी करने का सपना खतरे में पड़ जाता है।
सेक्टर पर क्या होगा असर?
अब प्राइवेट एजुकेशन सेक्टर में ट्रांसपेरेंसी (Transparency) का दौर आएगा। कॉलेजों के पास अब यह आजादी नहीं होगी कि वे अपने बढ़ते खर्चों का बोझ बीच कोर्स में ही छात्रों पर डाल सकें। भले ही कोर्ट ने सेल्फ-फाइनेंसिंग संस्थानों की जरूरतों को समझा है, लेकिन यह स्पष्ट किया है कि संस्थानों की स्वायत्तता का मतलब छात्रों की जेब पर मनमाना नियंत्रण नहीं है।
नई गाइडलाइन्स का असर
यह फैसला 'National Education Policy 2020' और 'AICTE' की गाइडलाइन्स के अनुरूप है। अब संस्थानों को अपने कोर्स की पूरी अवधि के लिए फीस स्ट्रक्चर में स्थिरता बनाए रखनी होगी। बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में ही बदलाव की अनुमति होगी, जिसके लिए भी कॉलेजों को पुख्ता कारण पेश करने होंगे। यह निर्णय भविष्य के सभी एडमिशंस के लिए एक मिसाल बनेगा और कॉलेजों को अब लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल प्लानिंग पहले ही करनी होगी।
