सुप्रीम कोर्ट ने नेक्स्ट-जेनरेशन जॉइंड ग्रीन क्रैकर्स के निर्माण की अनुमति दे दी है। उत्सर्जन में **30%** तक की कमी के आंकड़ों के बाद आया यह फैसला दिवाली से ठीक पहले पटाखा उद्योग के लिए एक बड़ी राहत है, जिससे पूरी तरह से बैन का खतरा टल गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पटाखा उद्योग के लिए रेगुलेटरी स्पष्टता प्रदान करते हुए नेक्स्ट-जेनरेशन जॉइंड ग्रीन क्रैकर्स के निर्माण को हरी झंडी दे दी है। यह फैसला CSIR-NEERI (Council of Scientific and Industrial Research-National Environmental Engineering Research Institute) के तकनीकी आकलन पर आधारित है। कोर्ट का यह रुख पूरी तरह से बैन लगाने के बजाय तकनीकी मानकों को सुधारने की ओर एक बड़ा संकेत है।
शिवकाशी के लिए बड़ी राहत
तमिलनाडु के शिवकाशी स्थित बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के लिए यह फैसला बेहद अहम है। पूर्ण प्रतिबंध से हजारों छोटे और मध्यम उद्यमों की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती थी। कोर्ट ने पटाखों में बेरियम साल्ट्स का इस्तेमाल हटाने और शेल डिजाइन में बदलाव करके आवाज कम करने जैसे कड़े तकनीकी मानक तय किए हैं। इससे अब पूरी इंडस्ट्री इनोवेशन की ओर कदम बढ़ाएगी, हालांकि कंपनियों को अपनी मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट में बदलाव करना पड़ सकता है।
क्या है ग्रीन क्रैकर्स की खासियत?
अनुसंधान संस्थानों की रिपोर्ट के मुताबिक, नए पटाखे 30% तक कम उत्सर्जन करते हैं और ठोस कचरे के उत्पादन में भी कमी लाते हैं। पटाखों की बर्निंग रेट को धीमा किया गया है ताकि हानिकारक पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन कम हो। तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने इस निर्णय का स्वागत किया है।
रिटेल मार्केट और स्थानीय जोखिम
हालांकि निर्माण की राह साफ हो गई है, लेकिन रिटेल मार्केट की स्थिति अब भी पेचीदा है। कोर्ट ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए पटाखे चलाने के समय को नियंत्रित करने का अधिकार अपने पास रखा है। दिल्ली-NCR जैसे क्षेत्रों में प्रदूषण के उच्च स्तर को देखते हुए राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर प्रतिबंध लगा सकती हैं, जिसका मतलब है कि राष्ट्रीय अनुमति के बावजूद बाजार में डिमांड असमान रह सकती है।
अब आगे क्या?
निवेशकों और व्यापारियों की नजर अब 15 अक्टूबर तक आने वाली एयर क्वालिटी मॉडलिंग स्टडी पर होगी। दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और भोपाल जैसे शहरों के नतीजे राज्य सरकारों की नीतियों को प्रभावित करेंगे। इसके अलावा, सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा डेसिबल लेवल और बेरियम कंटेंट की टेस्टिंग यह तय करेगी कि भविष्य में नियम कितने कड़े रहेंगे।
