प्रसिद्ध एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने संकेत दिया है कि अगर सरकार 'चलो संसद' मार्च के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न करने की लिखित गारंटी देती है, तो वह अपना **25**-दिन का अनशन समाप्त करने को तैयार हैं। यह प्रदर्शन NEET परीक्षा में हुई धांधली और छात्रों के साथ हुए अन्याय के खिलाफ है।
Detailed Coverage
सरकारी बातचीत और मुख्य मांगें
गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक से केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह की मुलाकात के बाद, एक्टिविस्ट ने कहा कि उनकी मुख्य मांगों पर प्रारंभिक चर्चा हुई है। इन मांगों में परीक्षा अनियमितताओं के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा और जवाबदेही पर संसदीय बहस शामिल है, जिसमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा भी है। हालाँकि, वांगचुक ने अपना अनशन तुरंत समाप्त करने की शर्त यह रखी है कि 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन में भाग लेने वाले छात्रों को किसी भी कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित रखा जाए।
विरोध प्रदर्शन का बैकग्राउंड
यह विरोध आंदोलन तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आया जब वांगचुक 28 जून को अनशन पर बैठे। इसकी शुरुआत कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अभिजीत दिपके द्वारा जंतर-मंतर पर किए गए प्रदर्शनों से हुई थी। मुख्य मुद्दा राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता पर है, जिसने छात्रों के बीच व्यापक अशांति पैदा कर दी है। दिल्ली पुलिस वांगचुक को 18 जुलाई को जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले गई थी, और स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण बाद में अदालत के आदेश पर उन्हें मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
आगे की उम्मीदें और संभावित समाधान
विभिन्न राजनीतिक दलों के लगभग 65 सांसदों से अनशन तोड़ने का प्रोत्साहन मिलने के बावजूद, वांगचुक का कहना है कि उनकी पहली जिम्मेदारी उन छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है जो इस आंदोलन में शामिल हुए थे। उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध को लोकतांत्रिक अधिकारों का एक वैध प्रयोग बताया है और कहा है कि जब तक छात्रों पर कार्रवाई का खतरा बना रहेगा, तब तक वह अपने सामान्य अकादमिक कार्य पर नहीं लौट सकते। इस स्थिति का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा को लेकर मांगी गई स्पष्ट, लिखित आश्वासन देती है या नहीं।
