आजकल कई हाई-अर्निंग भारतीय प्रोफेशनल सोशल मीडिया पर साथियों को देखकर विदेशी MBA करने की सोच रहे हैं। पर क्या यह वाकई सही है? इसमें भारी लोन और अनिश्चित जॉब मार्केट का बड़ा रिस्क है। कहीं ये FOMO (Fear of Missing Out) आपको महंगी न पड़ जाए, आइए जानते हैं पूरी सच्चाई।
करियर की बड़ी छलांग या महंगा शौक?
आजकल के युवा प्रोफेशनल्स में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है - वे बिना सोचे-समझे विदेशी MBA की ओर भाग रहे हैं। वजह? कहीं वो भी अपने दोस्तों या साथियों से पीछे न रह जाएं (FOMO - Fear of Missing Out)। Ankit Kedia, जो खुद IIM से पढ़े हैं, ऐसे ही एक केस का जिक्र करते हैं। एक प्रोफेशनल जिसकी सैलरी ₹2.5 लाख प्रति माह थी, उसने भी साथियों को विदेश में पढ़ते देखकर अचानक यह फैसला ले लिया। यह दिखाता है कि कैसे सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली 'परफेक्ट' सक्सेस स्टोरीज लोगों की सोच को प्रभावित कर रही हैं।
पैसों का गणित: रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) पर ध्यान
किसी भी प्रोफेशनल के लिए, विदेश में डिग्री हासिल करना एक बहुत बड़ा फाइनेंशियल फैसला होता है। इसे एक पर्सनल इन्वेस्टमेंट की तरह देखना चाहिए, जहाँ सबसे ज़रूरी है - रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI)। अक्सर लोग बड़े-बड़े एजुकेशन लोन के बोझ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिस पर भारी ब्याज देना पड़ता है, चाहे नौकरी मिले या न मिले। सच तो यह है कि इंटरनेशनल जॉब मार्केट बहुत कॉम्पिटिटिव है, और कई डेवलप्ड देशों में रहने का खर्च आपकी उम्मीदों से कहीं ज़्यादा हो सकता है।
उम्मीदें और हकीकत का अंतर
विदेशी डिग्री का आकर्षण अक्सर उन प्रैक्टिकल मुश्किलों को छुपा देता है जिनका सामना स्टूडेंट्स को ग्रेजुएशन के बाद करना पड़ता है। ग्लोबल एक्सपोज़र का वादा तो लुभावना है, लेकिन अगर उम्मीद के मुताबिक करियर ग्रोथ न मिले तो यह मोहभंग का कारण बन सकता है। कई बार तो भारी कर्ज़ और विदेश में समय बिताने के बाद भी, अगर वहां अच्छी नौकरी नहीं मिलती या रहने का खर्च बहुत ज़्यादा हो जाता है, तो लोगों को वापस भारत लौटना पड़ता है। ऐसे में, यह कदम करियर में एक बड़ी रुकावट बन सकता है, जिसे शायद भारत में रहकर टाला जा सकता था।
करियर के फैसले, सोच-समझकर लें
चाहे कोई इन्वेस्टर हो या प्रोफेशनल, हर कोई जानता है कि बड़े खर्चों के लिए पूरी प्लानिंग ज़रूरी है। जैसे कोई बिज़नेस यह तय करता है कि किसी नए प्रोजेक्ट से कितना कैश फ्लो आएगा ताकि लोन चुकाया जा सके, वैसे ही हमें भी यह देखना चाहिए कि क्या विदेशी डिग्री से हमारी लॉन्ग-टर्म कमाई बढ़ेगी। सिर्फ सोशल मीडिया पर दूसरों को देखकर ऐसे बड़े फाइनेंशियल फैसले लेना बहुत खतरनाक हो सकता है। इसलिए, महंगे कोर्स के लिए हामी भरने से पहले, सोशल मीडिया की चकाचौंध से बाहर निकलकर अपने करियर पाथ, सैलरी की उम्मीदों और निवेश पर मिलने वाले रिटर्न का गहराई से विश्लेषण करना बेहद ज़रूरी है।
