मार्केट में ट्रेडिंग करने वाले रिटेल ट्रेडर्स का एक समूह नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के विरोध में **12 अगस्त, 2026** को एक दिन का ट्रेडिंग बायकॉट करने जा रहा है। **3 अगस्त** को शुरू हुए इस नए **20 मिनट** के ऑक्शन मैकेनिज्म से F&O स्टॉक्स में इंडेक्स डाइवर्जेंस, लिक्विडिटी और ऑप्शन ट्रेडर्स के लिए संभावित नुकसान जैसी चिंताएं बढ़ गई हैं। यह विरोध टैक्स स्ट्रक्चर और रेगुलेटरी बदलावों को लेकर चल रहे असंतोष को भी दर्शाता है।
क्यों हो रहा है विरोध?
भारतीय शेयर बाजार में रिटेल ट्रेडर्स ने 12 अगस्त, 2026 को एक दिन के लिए ट्रेडिंग बंद करने का ऐलान किया है। इसका मुख्य कारण हाल ही में लागू किया गया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) है। सोशल मीडिया पर इस मुहिम को काफी समर्थन मिल रहा है। ट्रेडर्स का कहना है कि सेटलमेंट प्रोसेस में आए इस बदलाव के अलावा, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) जैसे टैक्स स्ट्रक्चर और बार-बार होने वाले रेगुलेटरी बदलावों से भी वे परेशान हैं।
नया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) क्या है?
इस विवाद की जड़ SEBI द्वारा 3 अगस्त, 2026 को लागू किया गया CAS है। पहले, स्टॉक्स की क्लोजिंग प्राइस पिछले 30 मिनट की वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) से तय होती थी। लेकिन अब, F&O में शामिल स्टॉक्स के लिए 3:15 PM से 3:35 PM तक 20 मिनट का एक स्पेशल ऑक्शन पीरियड होगा।
रेगुलेटर्स का कहना है कि इस बदलाव का मकसद प्राइस डिस्कवरी को बेहतर बनाना और भारतीय मार्केट को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के करीब लाना है। हालांकि, इससे कैश मार्केट (जो अब 3:35 PM पर बंद होगा) और डेरिवेटिव्स सेगमेंट (जहां ट्रेडिंग 3:40 PM तक चलेगी) के बीच टाइमिंग का अंतर पैदा हो गया है, जो ट्रेडर्स के लिए चिंता का सबब है।
ट्रेडर्स की मुख्य चिंताएं:
बायकॉट में शामिल रिटेल ट्रेडर्स का आरोप है कि यह नया ऑक्शन मैकेनिज्म मार्केट में 'ब्लाइंड स्पॉट्स' बना रहा है और मार्केट एफिशिएंसी को कम कर रहा है। उनकी एक बड़ी शिकायत यह है कि निफ्टी और सेंसेक्स जैसे बेंचमार्क इंडेक्स की क्लोजिंग वैल्यू में अंतर दिख रहा है। ट्रेडर्स का मानना है कि ऑक्शन प्रोसेस में पर्याप्त लिक्विडिटी न होने के कारण, क्लोजिंग प्राइस गलत हो सकते हैं, जिससे खासकर ऑप्शन ट्रेडर्स को नुकसान हो सकता है।
इसके अलावा, यह विरोध उस बात के खिलाफ भी है जिसे ट्रेडर्स 'फ्रीक्वेंट रेगुलेटरी चेंजेस' कह रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि ये बदलाव छोटे रिटेल इन्वेस्टर्स पर ज्यादा असर डालते हैं। इस बायकॉट का मकसद रेगुलेटर का ध्यान इस ओर खींचना है कि नए ऑक्शन विंडो में लिक्विडिटी की कमी है और कैश व F&O क्लोजिंग टाइम के अलाइन न होने से पोजीशन मैनेज करना मुश्किल हो रहा है।
रेगुलेटर का रुख और मार्केट पर असर:
रेगुलेटरी पॉइंट ऑफ व्यू से, इन बदलावों का उद्देश्य मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर को मॉडर्न बनाना और आखिरी मिनट की वोलैटिलिटी को कम करना है। अथॉरिटीज ने संकेत दिया है कि ये रिफॉर्म ग्लोबल मार्केट्स के साथ क्लोजिंग प्राइस तय करने के तरीकों को स्टैंडर्डाइज करने का हिस्सा हैं। फिलहाल, नए ऑक्शन सेशन को वापस लेने के कोई संकेत नहीं मिले हैं।
इन्वेस्टर्स और मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए, मुख्य चिंता 3:15 PM से 3:40 PM के विंडो के दौरान बढ़ी हुई वोलैटिलिटी और सेटलमेंट रिस्क की है। जैसे-जैसे 12 अगस्त की तारीख करीब आ रही है, यह देखना अहम होगा कि क्या कैश सेगमेंट में कम पार्टिसिपेशन से मार्केट डेप्थ पर असर पड़ता है या प्राइस इनएफिशिएंसी होती है। रिटेल सेंटीमेंट पर लॉन्ग-टर्म असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रेडर्स नए ऑक्शन मैकेनिज्म को कितनी जल्दी अपनाते हैं और क्या रेगुलेटर्स कैश और डेरिवेटिव्स क्लोजिंग टाइम के बीच के टेक्निकल फ्रिक्शन को दूर करने के लिए कोई और स्पष्टीकरण जारी करते हैं।
