राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (RRU) ने अपनी रिपीट परीक्षा फीस में भारी बढ़ोतरी कर दी है। पहले जो फीस **₹200** प्रति पेपर थी, उसे बढ़ाकर **₹5,000** प्रति सेमेस्टर कर दिया गया है। इस फैसले के खिलाफ छात्र **2025** के अंत से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
क्या हुआ?
गांधीनगर स्थित राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (RRU) ने अपनी रिपीट परीक्षा फीस में अचानक बड़ा इज़ाफा कर दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पहले जो फीस ₹200 प्रति पेपर ली जाती थी, उसे एकमुश्त ₹5,000 प्रति सेमेस्टर कर दिया है। यह बदलाव यूनिवर्सिटी की 32वीं अकादमिक काउंसिल मीटिंग में अगस्त 2025 में तय हुआ था और सितंबर 2025 के प्रमोशन गाइडलाइंस में लागू कर दिया गया। खास बात यह है कि फीस की यह नई दर लागू होगी, चाहे छात्र कितने भी विषयों की परीक्षा दोबारा क्यों न दे रहा हो।
छात्रों का विरोध और चिंताएं
फीस में इस भारी बढ़ोतरी का छात्र संगठन, खासकर बी.बी.ए. एल.एल.बी. के छात्र, नवंबर 2025 से ही लगातार विरोध कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि फीस में इस 25 गुना बढ़ोतरी के पीछे कोई ठोस वित्तीय कारण नहीं बताया गया है। उन्होंने यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर और रजिस्ट्रार सहित अन्य अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
इसके अलावा, फीस बढ़ाने के पीछे के कारणों को जानने के लिए एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) आवेदन भी किया गया था। जवाब में, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) ने कहा कि ऐसी कोई जानकारी उनके रिकॉर्ड में नहीं है। इस तरह के फैसलों में पारदर्शिता की कमी, खासकर सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में, प्रशासन और जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।
कानूनी दलीलें और मिसालें
24 मार्च 2026 को यूनिवर्सिटी के गवर्निंग बॉडी को सौंपी गई एक औपचारिक अर्जी में, छात्रों ने RRU एक्ट, 2020 की धारा 15 का हवाला दिया है। छात्र चाहते हैं कि यूनिवर्सिटी यह फीस बढ़ोतरी वापस ले और जो भी फीस ली गई है, उसे लौटाए। छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट के 'Modern Dental College & Research Centre v. State of MP' मामले के फैसले का भी जिक्र किया है।
उस ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शैक्षणिक संस्थानों को शिक्षा प्रदान करने की उचित लागत से ज़्यादा फीस नहीं लेनी चाहिए। छात्रों का तर्क है कि यह नई फीस संरचना इन सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे मुनाफ़ाखोरी माना जाना चाहिए, न कि लागत वसूली।
हितधारकों और विश्लेषकों के लिए खास बातें
यहां मुख्य मुद्दा यह है कि स्वायत्त शैक्षणिक निकायों में फीस निर्धारण के नियम कितने पारदर्शी हैं। भले ही RRU एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, यह विवाद दर्शाता है कि फीस ढांचे में अचानक किए गए प्रशासनिक फैसले, जब तर्कसंगत या लागत-आधारित औचित्य की कमी महसूस होती है, तो छात्रों के विरोध का सामना कर सकते हैं।
शिक्षा क्षेत्र पर नज़र रखने वाले निवेशकों या विश्लेषकों के लिए, यह मामला एक याद दिलाता है कि अचानक लागत संरचनाओं में बदलाव पर नियामक और जनता की कड़ी नज़र रहती है। ऐसी फीस बढ़ोतरी के खिलाफ कानूनी या नियामक चुनौतियां संस्थान के लिए बड़ी प्रतिष्ठा संबंधी जोखिम और अस्थिरता पैदा कर सकती हैं, जो शैक्षिक संस्थाओं का मूल्यांकन करते समय ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें हैं।
आगे क्या देखें?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मार्च 2026 में गवर्निंग बॉडी को सौंपी गई अर्जी पर विश्वविद्यालय का क्या जवाब आता है। इस विवाद में आगे क्या होता है, जैसे कि कोई कानूनी हस्तक्षेप या संस्थागत नीति की समीक्षा, यह तय करेगा कि मौजूदा फीस ढांचा बना रहता है या उसमें बदलाव होता है। निवेशकों और पर्यवेक्षकों को यह देखना चाहिए कि क्या विश्वविद्यालय संशोधित फीस को सही ठहराने के लिए कोई विस्तृत लागत विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो वर्तमान गतिरोध को हल करने में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
